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घूरना एक बिंदु को / रित्सुको कवाबाता

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मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: रित्सुको कवाबाता  » घूरना एक बिंदु को

मैं करती हूँ योगाभ्यास
बन जाती हूँ एक सारस !
मेरी फैली बाहें हैं पंख
खड़ी हो कर बायीं टांग पर
बाहें ऊपर-नीचे फड़फदाती
बनाने को संतुलन !
एक बिंदु दीवार पर
गति हो जाती है बद्द जैसे ही
मेरी दृष्टि जमती है !
जमाये दृष्टि उस बिंदु पर
लम्बे समय तक
मैं हूँ एक सारस !

अनुवादक: मंजुला सक्सेना