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घृणा थी रौंदी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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घृणा थी रौंदी
किसी का दु:ख देखा
तो हिस्सा माँगा,
सदा ज़हर मिला-
खुद पी डाला
चन्दन-सा जीवन
बना कोयला
फिर राख हुआ था
ख़ाक़ हुआ था
सब कुछ देकर
मैंने क्या पाया-
आहें और कराहें
छलनी हुआ सीना।