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घोड़े, सौदागर और जनतन्त्र / स्वप्निल श्रीवास्तव

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बचपन में पहली बार
देखे थे घोड़े
घोड़ों पर सवार थे
सौदागर
वे दूर देश से गांव के
हफ़्ता-बाज़ार में
आते थे
उन चीज़ों को साथ
लाते थे -- जो उस इलाके में
दुर्लभ थीं

वे गाँव के बाग़ान में
उतर कर सुस्ताते
घोड़ों को तालाब में पानी
पिलाते थे
गठरी से रोटी निकाल कर
अंगोछें में रखते थे और
इत्मीनान से खाते थे
उनके मुँह से चभर-चभर की
आवाज़ आती थी
उसके बाद वे बाज़ार का
रुख करते थे

घोड़ों के गले में बजती
थी घंटियां
लोग जान जाते कि
सौदागर आ गए हैं
सौदागरों के चेहरे हम जैसे थे
लेकिन वे भीतर से कांईयाँ थे

पिता कहते थे कि सौदागरों के
आँखों में सुअर का बाल
होता है
वे किसी के साथ मुरव्वत
नहीं करते

वे ग्राहकों को इस तरह ठगते थे
कि उन्हें अन्त तक नहीं
पता चलता था

बाज़ार में उनके सारे माल-असबाब
बिक जाते थे
घोड़ों की पीठ ख़ाली
हो जाती थी
लेकिन सौदागरों की जेंबें
भरी होती थीं

रात को वे हमारे दुआर पर
टिकते थे
घोड़ों को पेड़ से बाँध
देते थे
और चूल्हे पर भोजन
पकाते थे

उनका भोजन साधारण
होता था लेकिन वे आसाधारण
रूप से खाते थे
खाने के बाद वे लम्बी
डकार लेते थे
जिसे सुनकर घोड़े हिनहिनाते
हमें पता लग जाता था कि
सौदागर सो गए है

सौदागरों को जल्दी नींद
आ जाती थी
वें नींद में बड़बड़ाते थे
उनकी बड़बड़ाहट में बाज़ार के
हिसाब-किताब के सम्वाद
होते थे

घोड़े खड़े-खड़े सो जाते थे
उन्हें अच्छी नींद आती थी
अपनी थकान वे धूल में लोट कर
मिटाते थे

सौदागर अपने रूपए-पैसे टेंट में
छिपा कर सौते थे
आसपास की चीज़े बिखरी हुई
रहती थी
बाज़ार में लोगों की जेंबें कट
जाती थी लेकिन जेबकतरों की
उँगलियां उनकी जेब तक
नहीं पहुंच पाती थी

सुबह-सुबह सौदागरों के चेहरों
पर रौनक और घोड़ों की चाल में
फुर्ती होती थी
वे घर पहुँचकर किसी दूसरे
बाज़ार में जाने की तैयारी में
होते थे

  • *


फिर घोड़े सामन्तों के यहांँ
दिखाई दिए
वे उनके यातायात के साधन थे
उन्हें कहीं भी जाना होता था
वे घोड़ों के साथ जाते थे
वे हफ़्ते में दो-तीन दिन
घुड़सवारी का अभ्यास करते थे
और घोड़ों के बारे में सोचते थे
घुड़सवार उन्हें बताते थे कि कैसे
थामी जाए लगाम -- कैसे ऐड़
लगाई जाए और रकाब में किस
सावधानी के साथ रखे जाएँ
पाँव

वे बेलगाम घोड़ों को काबू में
रखने की हिक़मत बताते थे

सामन्तों के पास क़ीमती
घोड़े थे -- जिन्हे वे सोनपुर
या राजस्थान से ख़रीद कर
जमा किए हुए थे
इन घोड़ों को बचपन से
ट्रेनिंग दी जाती थी
फिर मैदान में उतारा जाता था

घोड़ों के अयाल बहुत मोहक
होते थे
इन्हें कायदे से सँवारा
जाता था
चलते समय अयाल हवा में
हिलते हुए अच्छे लगते थे

ख़ाली समय में घोड़ों के दो ही
काम थे-जुगाली करना या हिनहिनाना

सुबह-सुबह इन्हें घास के मैदानों में
छोड़ दिया जाता था
जहाँ वे पेट भर घास खाते थे
और उसे ज़्यादा रौंदते थे

कई घोड़े घास में ग़ायब
हो जाते थे
यह मुहावरा नहीं सच्चाई है

दार्शनिक घोड़ों को घास में
खोजते थे और जीवन की नई
व्याख्या करते थे

घास के मैदान से लौटने के बाद
घोड़े तालाब में नहाते थे
ताकि उनकी पीठ चमकदार
बनी रहे
अच्छे घोड़ों की पीठ धूप में
खूब चमकती थी

घोड़ों की शक़्ल-सूरत प्राय:
एक सी होती थी
वे अपनी नस्ल और कौशल से
पहचाने जाते थे

सामन्तों के पास दिखाने के लिए
हाथी होते है लेकिन वे घोड़ों पर
ज़्यादा भरोसा करते थे
बस ऐड़ लगाने की देर होती थी
वे सरपट दौडऩे लगते थे
यदा-कदा धौंस जमाने के लिए
हाथी की सवारी करते है और जवार में
अपना रूतबा दिखाने की कवायद
करते थे
जैसे महावत अँकुश लगाता
हाथी चिग्घाड़्ने लगता था
लोग चौंक उठते थे
इस उद्घोष के साथ सामन्तों का अहं
शान्त हो जाता था
वे ख़ुश हो जाते थे

हाथी का उपयोग सीमित होता था
घोड़े सम्भावना से भरे होते थे
उनके पास नहीं होता आलस्य
कोई रास्ता नहीं होता दुर्गम

ऐसे भी बदनसीब घोड़े होते थे
जो तांगे में जुतने के लिए
पैदा होते थे
उन्हें खाने के लिये दाने कम
चाबुक ज़्यादा मिलते थे

वे प्रतिरोध में तांगों को उलार
कर देते थे -- फिर मान-मनव्वल के बाद
ताँगों में नँधते थे
उनकी कहानियों में दुख और अफ़साने
बहुत थे

सबसे बुरी गत तो मिलेटरी के रिटायर
घोड़ों की होती थी
उनका अतीत स्वर्णिम और वर्तमान
अत्यन्त दुखदायी होता था
जिन शान से वे फौज में रहते थे वह
सेवानिवृत्त के बाद हवा हो जाती थी

वे रात में चुपके चुपके अच्छे दिन
याद करके रोते थे

दूसरी तरफ़ हार्स रेस के घोड़े थे
जिन पर बड़े-दाँव लगाये जाते थे

जो घोड़ा जीतता था वह
बाज़ार की मुख्य ख़बर बनता था
जो हार जाता था उसे गोली
मार दी जाती थी

घोड़ा हो या आदमी-दोनों का वक़्त
एक जैसा नहीं होता
परिस्थितियाँ नियति का निर्धारण
करती है

विरले घोड़े बाबा भारती का
सुल्तान बन कर इतिहास में
अमर हो पाते हैं

घोड़ों का ज़िक्र हो तो राणाप्रताप
और लक्ष्मीबाई के घोड़ों को
नहीं भूलना चाहिए
ये युद्ध के निर्णायक घोड़े थे
राजतन्त्र में घोड़े बादशाह की बग्घी में
नधते थे और रियासत की सैर
करते थे
इनकी पीठ पर बैठ कर
राजा शिकार पर जाता था और
बाघ मार कर लौटता था
यह बात अलग है कि शेर को
धोखे से मारा जाता था लेकिन
मुसाहिब उसे बड़े शिकारी के
रूतबे से नवाजते थे

ये विशिष्ट घोड़े अस्तबल में नहीं
महल में रहते थे
उनके पाँव में सोने की नाल
ठुकी रहती थी
सिर पर लहराती थी
कीमती कलगी
महारानियाँ उन्हें उनके नाम से
पुकारती थी
उनके अयाल सहलाती थी
घोड़े प्रेम में निमग्न हो जाते थे
वे दुलार प्रकट करने के लिए
धीमें से हिनहिनाते थे
उनकी हिनहिनाहट में लय और ध्वनि
होती थी

आख्यानों में उड़ने वाले और अश्वमेध
के घोड़ों का उल्लेख मिलता है
वे जादुई घोड़े थे
देवताओं का रथ सजाते थे
उन पर परियाँ बैठती थी
वे जिस रास्ते से जाते थे
वह आलोकित हो उठता था
घोड़ों के बिना रथ की कथा
अधूरी है
रथ में एक साथ कई घोड़े
नँधते है -- जिसे सारथी हाँकता है
और जंग जीतता है
लेकिन घोड़ों की भूमिका पर
इतिहास विचार नहीं करता
यह घोड़ों का अवमूल्यन है

यातायात के साधनों के विकास के बाद
घोड़ों का महत्व कम नहीं हुआ है
उन्हें जनतन्त्र के निर्माता के रूप में
जाना जाता है
वे राजनेताओं का भाग्य बदल
देते हैं
उनके बग़ैर नहीं हासिल होता
विश्वास मत

जनतन्त्र के वे घोड़े अपना पक्ष
चुनने के लिए स्वतन्त्र होते हैं
इसलिए बाज़ार में उनकी क़ीमत
अचानक बढ़ जाती है

जनतन्त्र का इतिहास यह भी
बताता है कि घोड़े अब विश्वनीय
नहीं रह गए हैं
वे कभी भी दुलत्ती मार सकते है
और विपक्ष में पहुँच कर बाज़ी
पलट देते हैं

जो बाजीगर घोड़ों पर दाँव लगाते हैं
वे जानते हैं कि घोड़े आदमी से ज़्यादा
चालाक होते है
उनके बिना जनतन्त्र की कल्पना
नहीं की जा सकती