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चन्दन वन / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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चन्दन वन
अपनों ने जलाया
बचे थे ठूँठ
थोड़ी- सी थी खुशबू
किसी कोने में
आखिरी साँस लेती,
कोई आ गया
धूप में छाया बन
प्राणपण से
मन व प्राणों पर
खुशबू बन
प्यार बन ,छा गया
जो कुछ बचा
वह उसी का रचा
उसी का रूप
सर्दी की वह धूप
और न कोई
केवल तुम्हीं तो हो
मेरी जीवन - आशा।
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