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चलो, चलें! / अज्ञेय

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जीवन-पट की धुँधली लिपि को व्यथा-नीर से धो चलें।
कहाँ फूल-फल, पत्ते-पल्लव? दावानल में राख हुए सब,
उजड़े-से मानस-कानन में नया बीज हम बो चलें।
इच्छा का है इधर रजत-पथ उधर हमारा कंटकमय पथ,

जीवन की बिखरी विभूति पर दो आँसू हम रो चलें!
विश्व-नगर से लुट कर आये, यह ममत्व भी क्यों रह जाये?
हो ही चुके पराजित तो अब अपनापन भी खो चलें!
आँख दिये की काजल-काली, चिर-जागर से है अरुणाली,
स्नेही! हम भी थके हुए हैं चिर निद्रा में सो चलें!
चलो चलें!
जीवन-पट की धुँधली लिपि को व्यथा-नीर से धो चलें!

मुलतान जेल, 1 नवम्बर, 1933