भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चांदी रात में महानदी में नौका-विहार / मायाधर मानसिंह / दिनेश कुमार माली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रचनाकार: मायाधर मानसिंह (1905-1973)

जन्मस्थान: पारिकुद (चिलिका), पुरी

कविता संग्रह: कोणार्क (1926), उपेक्षिता(1928), साधव झिअ(1929), शुभदृष्टि(1930), धूप(1932), हेमशस्य(1933), हेमपुष्प(1935), प्रेमपुष्प(1935), जेमा(1942), प्रेम शस्य(1945), कमलायन(1946), माटिवाणी(1947), जीवनचिता(1947), बापूतर्पण(1948), स्वराज्यश्रम (1952), सिंधु ओ बिंदु(1962), अक्षत(1962), मानसिंह ग्रंथावली(1962),निष्कोण


पत्थर के घर में, अंधेरे में, रहने वाला मैं, जननी !
पता नहीं था, तुम्हारे अद्भुत रूप की लीला, हे धरणी !
चांदनी रात में महानदी में चलाने से पहले तरणी

आहा ! कितनी विपुल शोभा मेरे आँखों के सामने
कैसे करुँ मैं वर्णन मेरे आकर्षक अनुभव का  ?
चौंधिया गई मेरी आँखें इस धवल-चाँदनी में
बंद हो गया मेरा पराभव मुँह इस चपल-चाँदनी में

रजनी- वधू सफेद चादर की तरह
फैला रही है चाँदनी दिगचक्र तक
नीचे धरती-तल की प्राकृतिक मधुरता
तुम्हारे संस्पर्श से और मधुर ।

आकाश के समान महानदी का जल
चंद्रिका चुंबन से धवल -चपल
तरल दर्पण जैसे बिछा दिया हो किसी ने
देखेंगे उसमे अपने बदन, नभ की सुहागिनें ।

दोनो किनारों पर पेड़ों की कतारें चाँदनी से धुला
पीला प्रकाश लिए तंद्रालस शिखर
बनाते स्वप्न नगर,
धीरे-धीरे बहती सुहावनी हवा चांदनी
बनाती मदमस्त डगर।

दूरवाही नाविक का सुगम संगीत
छूता नदी का वक्ष अक्षत
चांदनी में नदी के पानी का किनारों से टकराना
मानो लाखों चांदी के फूलों का एक साथ खिल जाना

पीछे फैली शुभ्र जल-राशि आकाश से मिलकर
दिखाती चंद्रिका चंदन से प्रलेपित पर्वतमालाओं
का सुंदर नील कलेवर।

पर्वतमाला के पीछे आकाश
सन्यासिनी के मुख के समान शांत सफेद
तलहटी में रजनी-वधू चांदनी के वस्त्र
उड़ाते खिलखिलाने लगती है पृथ्वी के संस्पर्श ।

इस भव्य चित्रगृह में मैं एक दीन-हीन अतिथि
देख रहा हूँ मुग्ध होकर महिमा मंडित
सोचता हूँ, हो जाऊं विलीन इस चांदनी में
और पान करूँ अमृतरस का इस स्रोत में ।

(2)
हाय, उत्कल भूमि ! तुम्हारा प्राकृतिक सौंदर्य
गंगा जैसी नदियाँ, कैलाश जैसे पर्वत
जंगलों में शोभा की अनमोल बहार
फिर आज क्यों हो इतनी हताश ?

जहाँ है स्वर्ग का सौंदर्य, वहाँ कैसे हो विश्वास
कैसे कहे, तुम्हारे यहाँ अन्न का अभाव ?
मदिरा की तरह मदमस्त बना दे जो मेरी हर साँस
उसके शरीर में कैसे संभव हुआ यह दुर्दिन प्रभाव ?

कानन-श्यामल-वास, शिखर मुकट
चरण चूमती महासागर लहरियाँ जिसकी
इतने सुंदर परिवेश की महिमा हो जिसकी
कौन करेगा साहस देने को अभिशाप उसे ?

इस बात का इतिहास साक्षी है, हे महानदी !
तेरे जल में तैरती नौकाओं का
जननी ! तुम्हारा गौरव आज भी
मेरी कल्पना, मेरी स्मृति में तरोताजा।

कभी तुम्हारे पर्वतों में
एक समृद्ध राजा बनाना चाहता था एक अजेय दुर्ग
पाना चाहता था तुम्हारी तरह वह यश-अपवर्ग

वह राजा अब कहाँ
कहाँ उसका किला
और वह वीर हृदय भी कहाँ
हे माँ ! तुम्हारा अतीत आज
रूक- रूककर कर रहा है क्रूर परिहास
शोक-व्यथामय।

(3)
नाव चल रही है मेरी बारबाटी तलहटी में
रुक जाओ नाविक, एक पल के लिए ही सही
माथा नवा लो इन सोपान प्रस्तर पर
और कर दो अपने अपदार्थ प्राण को कृत्यकृत्य

एक दिन उस चट्टान पर
सुकुमारी राजबाला छोड़ गई होगी अपने
अलता-रंग से रंगे पाँवों के निशान
झूम उठा होगा आनंद से वह कठोर पाषाण

एक दिन सखियों के संग रुपवती पटरानी ने
एक हाथ में दूब चावल, दूसरे हाथ में शंख लेकर
मंगल आशीष दिया होगा अपने विजयी पुत्रों को
आरती उतारकर घर लाई होगी इस चट्टान से

एक दिन इस शिला पर सौ- सौ नारियां
हल्दी लेपन से रंगे उनके कनक बदन
आरती उतारी होंगी शंख-ध्वनि से राजा की उस नाव की
भरकर लाया जो सिंहल से मुक्ता हार

इसी शिला पर एक दिन नगर जननी ने
भेजा होगा अपनी संतानों को पोत में समर-प्रांगण
देखा होगा दूर दिशा में उस वीर रमणी ने
छुपाकर गिरते आँसू अपने नयन ।

अब वे दिन कहाँ चले गए,हे शिला !
इस दुर्ग की छाया छा गई इस नदी-जल,
चकोर-चकोरी लाती रात की कलकल
जीवन-माया समझ नहीं पाई यह जाति विपत्ति-काल।

हमेशा के लिए कहाँ चले गए वे
न ही लौटेंगे राजारानी और वीर वे
न होगी इस बालू-तट पर और नाव-वंदन
न होंगे नागरिकों के और चरण-प्रक्षालन

और दुर्ग नहीं बनेगा ?
नहीं लौटेगी राजा की नाव मुक्ता लेकर
नहीं मधुर कंठ से मंगल-संगीत होगा
और न ही आरती उतारी जाएगी

हाय, विधाता !
क्यों नहीं कर दिया उस जाति का अंत
अपने गौरव को बचाने में असमर्थ
विश्व के आगे,
मरने से सौ गुणा बदत्तर !

(4)
ऐसी चांदनी रात में
अद्भुत शोभा के साथ
अरे कल्पना सजनी,
कहो मुझे !
उस दिन
सैंकड़ों नागरिकों से भरी
नाव में कैसे मुखरित हुई होगी वह रजनी !

राजा की हाथी-दांत नाव सबसे आगे
मधुर स्वर के उदगार,
राजा के कुंडल- मणि चाँदनी में
चमक रही होंगी सुंदर-फूल की तरह

राजा की नाव के पीछे सौ नावें
ऐश्वर्यशाली नागरिकों को लिए चलती
मुखरित होते नदी के सुगम गीत
आकुल जल का यह गर्जन-संगीत

ऊपर के चंद्रपुर में राजारानी
स्वर्णद्वीप छोड़कर हुए वातायन-मुखी
देखकर यह महालीला, नहीं निकली होगी वाणी
नहीं आई होगी मुँह में भाषा, जब प्राण हुए होंगे सुखी ?

अगले कक्ष में राजवधू कोमलांगी किशोरी
सुंदर सखियों के संग लिए फूलहार
देख रही होगी चंद्रमा की आलौकिक शोभा
ऐसी सुंदर वेला में मिला होगा उसे राजकुमार

किनारे बज रही होगी नहवत, कंपाते धरणी
पर्वतमाला के उस पार से सुनाई देती प्रतिध्वनि
चमक उठे होंगे सारे दुर्ग कक्ष और राजा की नाव
उन्माद से नाचने लगा होगा महानदी-आब

उस दिन अगर मैं राजा के साथ होता,
दिल खोलकर गीत गाता, हे विधाता  !
गुणी राजा खुश होकर क्या नहीं देता
मुझे सोने की अशर्फियाँ ?

(5)
लौटने को कह रहे हो, बंधु ! फिर से उस अंधकार में
लौटना होगा वास्तव में ? हाय ! यह जीवन
अवसर नहीं मिलता है क्षण में भूल जाने का
जीवन का हाहाकार और प्राणों का दहन !

चंद्रमा चढ़ रहा है ऊपर विराट धरती-तल
नीरव निस्तब्ध शांत महानदी जल
क्लांत शिशु की तरह एकदम शांत
करती नभ, जल, स्थल में उज्ज्वल रजनी पक्षपात।

इस महानीरव क्षण में, इस चांदनी के तल में
मैं विमुग्ध हुआ इस विपुल शोभा से
आहा ! कैसे करुँ अनुभव स्पर्श के इस अंतर का,
वचनातीत, मैं प्रणाम करता हूँ उसको।

वह जो सत्य, वह जो शिव, वह जो सुंदर
सारी पृथ्वी जिसके अणु, परमाणु, रेणु
कर रहे हैं अनंत लीला,असीम हुनर
एक क्षण में बनाता है
उसकी भव्य महापूजा वेदी।

हे बंधु ! पाकर आज इस आकाश तल में
मेरी जाति का अतीत साक्षी
इस नदी की पुलकित चांदनी का महाभोज्य
इस नदी को साष्टांग प्रणाम करो
उसकी महानता को उतारो अपने जीवन में

इच्छा मेरी हो रही है इस निर्मला रजनी में
खोजने को तुम्हारे शुभ और सत्य
इस चांदनी के तल में
बहेगी यह नाव मृत्यु पर्यंत
और नहीं लौटेगी फिर से महा अंधकार में।