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चांद नहीं दिखाया / ओम पुरोहित ‘कागद’

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उन्होंने
बार-बार
हमें
चांद पर
ले जाने के
स्वपन दिखाए
परन्तु
एक बार भी
चांद नहीं दिखाया ।

उस समय तक
हम
जिसको उन्होंने
चांद कहा
उसको ही
चांद कहते रहे ।

जिस दिन
हमारे ऊपर
चांद निकला
उस दिन
घर से बाहर
निकलने की
सख्त मनाही थी

अनुवाद-अंकिता पुरोहित "कागदांश"