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चालीस दिनों तक कोई कविता नहीं… / बरीस गुमिन्यूक / राजेश चन्द्र

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चालीस दिनों तक कोई कविता नहीं…
कविता क़ब्र में पहुँच गई थी
जब 23 नवम्बर को
एंड्रिय युर्गा, स्वयंसेवक सैनिकों की
‘‘ओयूएन‘‘ बटालियन का एक योद्धा
मारा गया पिस्की की लड़ाई में
वह लुहविईव से आया था, उपनाम था ‘‘डेविड‘‘।

कविता में छा गया अन्धकार
उसने कपड़े पहने शोक के चालीस दिनों तक
तब इसे ढँक दिया गया था मिट्टी से
उसके बाद राख से

चालीस दिनों तक कविता बैठी रही खन्दकों में
अपने दाँत पीसती पलट कर गोलीबारी करती सन्नाटे में
कविता बात नहीं करना चाहती थी किसी से
बात करने के लिए वहाँ था भी क्या ?
मौत ?

उन चालीस दिनों में कविता ने देखीं कितनी ही मौतें ।
कविता ने देखा पेड़ों को मरते हुए ।
उनको भी जो विनाश के एक विस्फोट-क्षेत्र से होकर भागे
और उन्हें देखने को नहीं मिलीं फिर कभीे सर्दियाँ ।

कविता ने देखा जानवरों को मरते हुए ।
घायल बिल्लियों और कुत्तों को
अपनी अन्तड़ियाँ घसीट कर ले जाते हुए सड़कों पर
जैसे कि यह कोई मामूली बात हो
कविता को मालूम नहीं था कि करना क्या है :
तरस खाओ और मरने में उनकी मदद करो, या
तरस खाओ और जीने दो उन्हें उनके हाल पर ।

कविता ने तबाह होते देखा घरों को ।
उनका घर,
तुम्हारा घर ।
क्या वह घर तुम्हारा था
वहाँ उस तरफ़, कोने के आसपास ?

साल भर पहले, एक आम घर
सामने फूलों के दालान के साथ
और एक बग़ीचा पिछवाड़े,
जिसमें सेब, बेर, नाशपाती के पेड़,
एक अदद अखरोट का पेड़ भी बगीचे में
हुआ करता था उन लोगों के साथ-साथ
जो रहा करते थे वहाँ ।

जब पहली गोली आई
घर को कुछ समझ में नहीं आया
वह हाँफने लगा चुपचाप
और चुपचाप ही रोता रहा :
गोली ने घाव कर दिया था एक दीवार में ।

फिर अन्य गोलियाँ आईं
घर को कोई अन्दाज़ा नहीं था कि वे कब चली आएँगी
वह कतई तैयार नहीं था इसके लिए
कि ढँक ले ख़ुद को हाथों से
छिप ही जाए कहीं अटारी में या
तहख़ाने में जाकर ।

गोलियों ने छलनी कर दिया दीवारों को
तोड़ दीं खिड़कियाँ
वे उड़ती फिर रही थीं घर के भीतर
रसोई, बैठकख़ाने,
बच्चों के कमरे में ।
उन्हें तलाश थी लोगों की ।
गोलियों को हमेशा तलाश रहती है लोगों की ।

लोग हमेशा एक घर की वजह होते हैं ।
जब मोर्टार शेल आ गया
शरद काल में, तो जिन घरों में आती थीं आवाज़ें
अखरोट और सेब के
छत से टकराने की,
अब उन्हीं छतों से टकराने लगे गोले ।

फिर आया एक रॉकेट जिसे दागा गया था रॉकेट लॉन्चर से ।
घर उछल-कूद करने लगा किसी बच्ची की तरह
ग्रीष्म की उत्तप्त आग पर कुदक रही हो जो
यह जैसे हवा में लटका रहा कुछ क्षणों के लिए
फिर उतर आया नीचे धीरे-धीरे
लेकिन अब वह सीधे खड़े होने की हालत में नहीं था।
दीवारें, फ़र्श, फ़र्नीचर,
बच्चों के खिलौने, बरतन, दादाजी की घड़ी,
सब एक-एक कर आ गए थे ज़द में युद्ध की,
आग ने सब चाट लिया था।

कविता ने देखा लोगों को मरते हुए ।
कविता ने ठूँस ली थीं गोलियाँ अपने कानों में ।
कविता कुछ-कुछ अन्धी हो भी हो चली थी
हर दिन लाशें देखते-देखते ।

कविता स्वर्ग तक पहुंचने का सँक्षिप्त रास्ता है ।
कविता ताकती रहती है शून्य में ।
जब तुम धराशाई होते हो
यह तुम्हें याद दिलाती है वापसी के तुम्हारे रास्ते की ।
कविता वहाँ तक जा पहुँचती है
जहाँ कोई जगह नहीं होती कविता के लिए ।

कविता साक्षी है इस सबकी ।
कविता साक्षी है इस सबकी ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : राजेश चन्द्र