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चिलिका / राधानाथ राय / दिनेश कुमार माली

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रचनाकार: राधानाथ राय (1848-1908) “कविवर”

जन्मस्थान: केदारपुर, बालेश्वर

कविता संग्रह: कवितावली(1873), मेघदूत(1878), शिवाजींकर उत्साह वाक्य(1880), केदारगौरी(1886), चंद्रभागा(1886), नंदिकेश्वरी(1887), उषा(1888), पार्वती(1890), चिलिका(1892), महायात्रा(1892) तुलसी स्तवक(1894), दरबार(1887), ययातिकेशरी(1898),उर्वशी,दशरथ वियोग (1900),क्षुद्र रचनावली (1904)


उत्कल/लक्ष्मी विलास/दीर्घिका
हंसों से भरी नीलांबू चिलिका
उत्कल की तुम सुंदर अलंकार
उत्कल प्रदेश का शोभा भंडार
स्वभाव में भावुक, मन/उल्लासी
दिगंत प्रसारित विपुल जल/राशि
प्रसन्न/बदन उज्ज्वल वर्णी
मुखश्री देखती जिसमें दिशा/रमणी
नीले अंगों का तेरा चित्र/अंतराल
टापू, नलवन, शैल, द्वीपमाल
दक्षिण में मिलता तुम्हारे गर्भ आकर
सूर्य/रश्मियों से चमकता रंभा/भूधर
विमान आकार में तैरते शत/शत
तुम्हारे नीले/वक्ष पर शैल/मरकत
इंद्र द्वारा पंख कटने के भय में
क्या छुप गए पर्वत तुम्हारे जल में ?
सान्निध्य माँ भगवती का पाकर
जटिल गुल्मों से भरे तुम्हारे शिखर ?
मंदिर मुकुट कालिजाई पर्वत
मरकत मणि की तरह हुआ प्रख्यात
सफेद चिडियागुहा पहाड़ समुदगत
पानी भेदकर उठा मानो ऐरावत !
लहरों से घिरा कांकण/पर्वत/शिखर
प्रथम पूजन में जिसकी नाव भर
सालों साल चिलिका झील के धीवर
सादर भोग चढ़ाते लक्ष्मी/रसोई/घर
जहाँ जहाँ पानी टकराता बालूपथ
स्वच्छ आकाश में मानो छायापथ
तारों के बीच जैसे दिखती नीहारिका
मोती सदृश सफेद द्वीपों की तालिका
चारू/तीर तुम्हारा शोभा/आश्रम
शैल, पथरीला वन मधुर विषम
गिरिखोल, पर्वत, जंगल, कंदर
सुरम्य नदी जल मनोहर
विकट घाटी भरे तुंग शैल सानू
गतिपथ में जहाँ छूता भानू
कहीं नीले भंवर कहीं गहरे विवर
नागमणि सदृश चमकते भास्वर
भग्न दुर्ग, जर्जरित देवल
शैवाल/अरण्य लता गुल्माकूल
मूर्तिमती होकर भव/भंगुरता
प्रतिध्वनित करती यह कथा
कुरंग/कुरंगी/चिर/क्रीड़ास्थल
नव दुर्वा श्यामल तृण दल
विशाल द्वीप मन मोहकरी
मरीचिका जिसकी चिर/सहचरी
द्वीपमाला शस्य हरित समान
ये सब तुम्हारे शोभा/उपादान
ऐसी सुंदरता सब मिलती जहाँ
सुंदर उत्कल में अतुल तुम वहाँ
बहुत दिन मैं घूमा अविरत
देखे अनेक स्थान भू भारत
क्या उत्तर, क्या दक्षिण/ भारत
घूमा मैं भाग्य से चक्रवत
भारत की रत्न सीमंत अचल
देखे हिमाद्रि हिम उज्ज्वल
पाद में जिसके कोटि शिखर/समाज
सर्वोच्च शोभायमान शुभ्र/शैलराज
शिखर पर शिखर फिर महाशिखर
नीले व्योमपट पर चित्र अमर
नीहार मुकुट में मस्तक मंडित
पास में शोभित शुभ्र गंगा/उपवीत
निस्तब्ध/ नीरव महा/ एकांत
सनातन आसन तुषार श्वेत
व्योमकेश मूर्ति देख हुआ चकित
देखते/देखते थका न मेरा चित्त
मन ही मन करता नमस्कार नीरवे
“नमो देवात्मने, श्री गौरी गुरवे !”
राजस्थान में देखा भयंकर मरूस्थल
देखा भीषण रुक्ष शैलावल
नीर/तरू/हीन, उबड़/खाबड़, कर्कश
कराल/काल की तरह काटता सर्वंकश
सूर्य/किरणों का ताप अतिशय
नवागत भोगता श्वास /विस्मय
गर्म हवा का प्रचंड/संचरण
पथिक का हरता प्राण प्रतिक्षण
छाया नाम पर खड़ी केवल नागफनी
जल के लिए मरीचिका/वेनी
तृषातुर रोगी बैठकर घर
करता याद कमल हर
उस सूखे दृश्य में स्निग्ध छबि तुम्हारी
नैत्र अतिथि बनकर याद करते मेरी
घूमा भीषण विंध्य/पर्वत, जंगल, कंदर
गिरते जहाँ ‘धुआँधार’ झरनें शतधार
भैरव/रव में देती वहाँ नर्मदा लंप
पैदा हो उठती जनमानस में प्रकंप
शुभ्र स्वच्छ पयः प्रपात/सुभगा
शिव जटा से निकली जैसे त्रिपथगा
ठंडे बादलों पर सूर्य/किरणें गिरकर
बनाती सप्तरंगी इंद्र/घनुष मनोहर
सुना था कानों से वह भयंकर/रव
ऊपर देखा था वह जल/तांडव।
घूमा था दक्षिण भारत की उपत्यका
झाड़ियों से भरे अरण्य/दंडका
तीर्थाश्रम, गिरी, नदी, कंदर
महा अरण्य से भरे चित्र कलेवर
दूषण/त्रिशिरा/सर अद्यासित
जन्म स्थान थे जिसके सन्निहित
धारास्रावी, भीमरावी, तड़ितवत
मेघ/गर्जन से कंपाती दिगंत
जहाँ मेघ/आलोक से प्रफुल्ल अंतर
सीता पालित मयूर वंशधर
कदंब पेड़ों पर नृत्य करते नीलकंठ केका
आज तक प्रमाणदेती रामाश्रम नेका
भीषण गुफाओं के बीच मैं बैठा जहाँ
गदगद शब्द करती गोदावरी वहाँ
संकीर्ण रास्ते, पहाड़ी झरने
कौन भूल सकेगा उन्हें ?
वात्या आंदोलित भीषण
घूमा भयंकर राज्य वरूण
जहाँ दिग्वलय में सूरज दिखता चक्र
वहाँ नीले आकाश में नीले समुद्र का परिचक्र
उर्मिकाओं के ऊपर उर्मिकाओं की गति
जहाजों को ग्रसने आती द्रुत/गति
स्तब्ध/भाव से देखे ये सारे दृश्यमान
देखे भारत में घूमकर नाना/स्थान
भीषण, विराट, विकट, उदार
दृश्य देखकर हुआ विस्मय अपार
मन भी भूल जाता अपना रास्ता
महाभाव में मानों डुबी हो सत्ता
जैसे दिन के सामय तारों का आगमन
वैसे अस्मिता विस्मय का हुआ निगमन
गुरु जैसे तुम्हारा दूर करता भीत
सखी वैसे तुम्हें याद करता नीत
मूर्ख जनों का अवसाद हर
योगी ऋषियों का यह स्थान मनोहर
सूर्य किरणों से कमल का खिलना
अन्यत्र फूलों का मुरझा जाना
वे फूल फिर शीतल चंद्रमा में
पीते अमृत प्रफुल्ल/अंतर में
उनके छबि/दर्शन से मेरा मन
पाता सुमधुर शांति आस्वादन
विराट ही नहीं तुम हो सुवृहत
स्तब्ध ही नहीं हुआ मन उन्नत
अवसाद हो या आत्म/विस्मृति
अविस्मरणीय तुम्हारा रम्य तीर
स्निग्ध रूप तेरा चित्त/उल्लासक
सुमधुर द्वैत/भाव का द्योतक
संगीत तुम्हारा चिर सहचर
नील/वक्ष तेरा संगीत/मुखर
तैरते सफेद महलों के अंग
गाते विहंग तरंगों के संग
पंख झाड़ शून्य में स्थिर होई
चलती मछली को मारती गोगोई
काला, नीला, पीला, हरा, लोहित
विहंगम उर्मिकाओं से विमंडित
जलदेवी कल पायल की झंकार
सुनता हूँ हंसों की चीत्कार
(.....आंशिक)