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चिल्होर भइल नजर / ब्रजकिशोर

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ई उफनत नदी के धार, बाढ़ के पानी,
चारु ओर समुन्दर के हलफा
ढह गइल माटी के दीवार, माटी के देह,
आदमी आ जानवर एक हो गइल।
बेरही में सईंतल अनाज दह गइल
जे रहे से देखते में आज बह गइल।
पता ना नन्हका के छोट-छोट ओठ
पड़ल चकोह में का-का कह गइल !
राहत का नाँव पर बोल गइल चिरई
मँड़रा के गीध अस हेलिकोप्टर मंत्री के
ऊपरे-से ऊपर खबर बटोर गइल।
हाकिम-हुक्काम सभे खेलत बा झिझिरी,
मस्ती-मउज के मिल बा मोंका ई
सरकारी माल पर नजर चिल्होर भइल।
मुट्ठी भर चना आ चुटुकी भर भेली
उतर जाई पानी फिर केहू दे ली !
राह त राहत के रही अनदेखल
जेकरा पर पड़ल बा अपने ऊ झेली !
अतना अकास अस पसर गइल मन
कि लाश पर बइठ-बइठ राजनीति खेली !
एह देश में केहू मरे ना भूखे,
ई बाढ़ के पानी कबहीं ना सूखे।