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चींटियों का गीत / पामेला स्पिरो वैगनर / अनिल जनविजय

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उन श्रोताओं के लिए जो हिमपात में भी सुनते रहते हैं ...
वाल्लेस स्टिवन्स

मुझे हमेशा ठण्ड लगती थी
क्योंकि मैं जाड़ों से डरती थी
तेज़ गर्मियों के दिनों में भी

हमेशा... हमेशा मैं सर्दियों की छूत से घबराती थी
डरती थी बर्फ़ीले मौसम के नर्क में डूबने से पहले
कि सब कुछ ख़त्म हो जाएगा प्रिय

फिर भी हवा थी
हवा थी, जो रचती थी संगीत
और मैं थी, जिसपर चढ़ी रहती थी
अजीब-सी कँपकँपी हवा की

विनयी पेड़ों को झुकाती हुई हवा
उनकी शाखाओं में संगीत भरती हुई
वृक्ष-वनों को गीतों से सहलाती हुई हवा

बदलाव हमें बदलते हैं,
मौसम भी बदलता है जीवन-मृत्यु के चक्र की तरह
और हम ख़ुद को सम्भाले रहते हैं
जीवन-गीत गाने के लिए।

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : अनिल जनविजय

लीजिए, अब यही कविता अँग्रेज़ी में पढ़िए
              Pamela Spiro Wagner
              The Song Of The Ant

"For the listener, who listens in the snow..."
Wallace Stevens


In those days I was always cold
as I had been a long time, mindful of winter
even at the solstice of my high summer days

always, always the crumb and crust of loss
and near-loss of everything held dear
before the saison d'enfers and the ice to come

Still there was the wind
There was the wind making music,
and I, at one with the quirky stir of air

bowing the suppliant trees
bowing the branches of those trees for the sound
of songs held long in their wood

Changes change us: rings of birth, death, another season
and we hold on for nothing and no reason
but to sing.