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चेतन दातार के लिए / ममता जी० सागर

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इस तट पर मैं कर रही हूँ प्रतीक्षा
डूब गई संध्या
जगी नहीं है रात अब तक
जैसे बालों में उँगलियों का फिरना
वैसे गुज़र रहा है पवन
सरसराता हुआ पत्तियों से

तुम्हारी गर्म साँस मेरी पीठ पर
मैं बस खड़ी हूँ यहीं
बिना मुड़े पीछे
कहीं दूर खोई हुई लहर
बता रही मुड़ कर इस तरफ़
तुम्हारी नाव गुज़री है यहीं से
कभी पता ही नहीं चला
कैसे चुपचाप चले गए तुम
हृदय
टुकड़ा-टुकड़ा
टुकड़ा-टुकड़ा चाँद
बिखर गया पानी में

दिग्भ्रान्त अकेले बादल
अपनी ही छायाओं के पीछे
दौड़ते हुए
मैं यहाँ हूँ ऎसे ही
नाव इस तट पर खड़ी
चुनती हुई
यादें।

अनुवाद : एकान्त श्रीवास्तव