भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जंगल झाड़ बोझड़यां मैं फिरूं अंजना अंजना करता / मेहर सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वार्ता- अंजना ऋषि की कुटिया पर रहने लग जाती है उधर पवन अंजना की तलाश में निकलता है। गहरे जंगल में अंजना को बहुत तलाश करता है। लेकिन अंजना उसे नहीं मिलती तो क्या कहता है-

बहुत देर हुई चलते चलते थक लिया फिरता फिरता।
जंगल झाड़ बोझड़यां मैं फिरूं अंजना अंजना करता।टेक

घटग्या त्यौर दिखाई नादे बुझण आई कोन्या
एक मिनट की देर नहीं मेरे गात समाई कोन्या
मरण तै आगै मेरे खातिर कोए और दवाई कोन्या
सारा जंगल छाण लिया पर अंजना पाई कोन्या
आज मैं भी न्यारा वा भी न्यारी म्हारा हांडै प्यार बिखरता।

अंजना प्यारी इस जंगल में खूब बिचल ली होगी
मेरे बिना इस गहरे जंगल में एक ली फिर ली होगी
घर तै लिकड़े पाछै भूखी प्यासी मर ली होगी
मिली अंगुठी मनै अंजना की वा चौकस मर ली होगी
अंजना प्यारी तेरे बिना मनै हरगिज भी ना सरता।

बेरा ना कित चली गई भगवान दिखती कोन्या
चौगरदे नें देख लई दे ध्यान दिखती कोन्या
भूरा भूरा गात उमर की जवान, दिखती कोन्या
फेर्यां की गुनाहगार नार की शान दिखती कोन्या
म्हारे घरक्यां नै तोहमद ला कै काढ़ दई पतिव्रता।

अंजना प्यारी तेरी बिना मनै निश्चय मरणा सै
जीऊंगा तै ईब तै आगै दूणा दुःख भरणा सै
अंजना मरली मैं भी मरज्यां जी कै के कारणा सै
हे मालिक ईब आखिर मैं बस तेरा ऐ सरणा सै
गुरु लखमी चन्द की नाव मेहर सिंह पार चला गया तरता।