भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जद तूँ आई ज़िंदगाणी मैं / मनोज चारण 'कुमार'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जद जलमी बाबल रै आंगणियै, लोग कह्यो लिछमी जायी,
तूं छोङ भरयो घर बाबल रो, अणजाण घरै चली आयी।
तूं याद कर फेरा रातां नै, अर सात बचन री बातां नै,
डावोङै पासै बैठी तूं, अर जीवणो हाथ दियो हाथां मैं।
है याद घणूं आछी तरियां, बो हाथ जरा सो कांपै हो,
कै हो थारो पैमानूं बो, जको मनै ही भांपै हो।
हथळेवै री बा मैंदी भी, गैरा सा रंग दिरावै ही,
बिदाकी आळी बेळ्यां तूं, जद आंसूङा ढळकावै ही।
मैं घणूं अमूझ्यो उण बेळ्यां, कीं बात समझ नीं आवै ही,
बातां समझी मैं सगळी बै, जद बैन सासरै जावै ही।
तूं आई सुरंगै बेसां मैं, जद रूप निराळो थारो हो,
कूंकू पगल्या जद तूं मांड्या, हियो डोलग्यो म्हारो हो।
थारै बाबल री तूं लाडेसर, अर म्हारै बापजी मन भायी,
दादोजी निछरावळ कर रया हा, दादी आशीषां खळकायी।
माँ रो बधग्यो रूतबो अब, सास कहीजण लागी जद,
कैती ध्यान राख बीनणी, घर की कदे ना लांघी हद।
सै भाई बैन भी राजी हा, जद भौजाई घर मैं आगी,
अब होळी रा रंग खेलस्यां, भौजाई आय गयी सागी।
म्हारो भी मन हरसै हो, अर बेलीङा फोङा घालै हा,
गोठ करांला घणी जोरकी, बैरीङा नित रा सालै हा।
कई बदळाव हुया स्याणी, म्हारी बीं आळ जवानी मैं,
कई नंवा रिश्ता जुङग्या गजबण, जद आई तूं जिंनगानी मैं।