भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जन-संगीत / जनकवि भोला

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हम चहनी, चाहींला, चाहत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
तोहरे पिरितिया के याद में जिनिगिया
निंदवा में अइतू सुनइती हम गीतिया
कहां चल जालू निंदवा में खोजत बानी
कबहूं....
दिन रात के बाड़ू हो तू ही दरपनवा
जवरे पिरितिया के गाइला हो गनवा
काहे जनबू ना जान जनावत बानी
कबहूं....
ना देखती कउनो हम कबो सपनवा
शहीदन के हउवे ई प्यारा जहनवा
अब कउनो ना डर बा जानत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी