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जब तय किया नहीं चलूंगा लीक पर / सांवर दइया

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जब तय किया नहीं चलूंगा लीक पर।
दुनिया बोली- अपना चलन ठीक कर।

बड़े अंदाज से पूछते वे हमको-
क्या पाया इस मौसम को रक़ीब कर?

आ, अब कारणों के कारण तलाशें,
कब तक रोते रहें सिर्फ नसीब पर?

हर आंगन में हों खुशी के फव्वारे,
जी रहे सिर्फ उस दिन की उम्मीद पर।

कहने को लाखों आराम कर दिए,
मगर हम तो हैं आज भी सलीब पर।