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जब से बरसों पुराना दर्द बिछड़ा है / सांवर दइया

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जब से बरसों पुराना दर्द बिछड़ा है।
तभी से यह मन बहुत उखड़ा-उखड़ा है।

किस्सा-ए-तबस्सुम कैसे करें हम बयां,
अपना तो अश्कों से वास्ता पड़ा है।

आंखों आगे ढह रही इमारत अपनी,
आप कह रहे- ज़रा पलस्तर उखड़ा है!

फलसफे जो भी पढ़े, तेरे साथ पढ़े,
देख ले हर किताब, सफा वहीं मुड़ा है।

हक़ न छीनो सरेआम ग़ज़ल कहने का,
मेरा जीना-मरना ग़ज़ल से जुड़ा है!