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जवाब / नीना कुमार

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कह दो साज़िश-ए-हयात[1] का है यह वाक़िया[2] एक सबूत
कह दो उलझन-ए-ज़ीस्त[3] का है ये एक जाल-ए-अन्कबूत[4]

एक हलचल सी वीरानियों में उठी और गुबार उफ़क़[5] पे
के बढ़ रहा है शोर-ओ-गुल, छीनने को दश्त[6] का सुकूत[7]

घिरे बिजली-ए-शमशीर[8] चमक से जिस सिम्त[9] गई निगाह
क्या मेरा फरेब-ए-नज़र[10] था ये, या एक वहम-ए-मख्बूत[11]

क्यों मैदान-ए-जंग बन रही दिल की ज़मीन यहाँ पे
किस तरह की आग में धुंआ हो रहा है लहू-ए-नासूत[12]

चलो पूछ लो सवाल आज, आएँ जितने भी ज़ेहन में
के आख़िरी जवाब-ए-ज़िन्दगी तो देगा जहाँ-ए-लाहूत[13]

शब्दार्थ
  1. जीवन का षड्यंत्र
  2. घटना
  3. ज़िन्दगी की उलझन
  4. मकड़ी का जाल
  5. क्षितिज
  6. रेगिस्तान
  7. ख़ामोशी, चुप्पी, शान्ति
  8. तलवार की बिजली
  9. दिशा
  10. नज़र का धोखा
  11. पागल का वहम
  12. मनुष्य का लहू
  13. सर्व-व्यापी व सर्वशक्तिमान का संसार