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जवाब / शेरको बेकस / अनिल जनविजय

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हलाब्या में की गई
उस दमघोंटू कार्रवाई के बाद
मैंने ख़ुदा को
एक लम्बी शिकायती-चिट्ठी लिखी थी
जिसे पढ़ता था मैं
हर किसी के सामने ।

मैंने वो चिट्ठी
एक पेड़ के सामने पढ़ी
वो चीख़ने लगा घबराकर
एक चिड़िया को पढ़कर सुनाई वो चिट्ठी
वो उड़ गई फुर्र से डरकर
फिर एक डाकिए को पढ़कर सुनाई वो चिट्ठी ।

मेरी शिकायत सुनकर
डाकिया बोला —
तुम्हारी शिकायत ठीक है,
पर ख़ुदा तक ये चिट्ठी
पहुँचाएगा कौन ?

अगर तुम सोचते हो
कि मैं ये चिट्ठी ले जाऊँगा
तो ये जान लो
ख़ुदा के दरबार तक
मेरी कोई पहुँच नहीं है ।

उस दिन देर रात
मेरी देवदूती कविता ने
पहन लिए शोक-वस्त्र
और मुझसे बोली —
मैं अन्तरिक्ष की ऊँचाइयों तक
ले जाऊँगी तुम्हारी चिट्ठी
पर वायदा नहीं करती
पहुँचा पाऊँगी उसे ख़ुदा तक
या नहीं ।

ख़ुदा ख़ुद आएगा
और ये चिट्ठी ले जाएगा
भगवान है महान्
तुम तो जानते हो
किसने उसे देखा है आज तक ?

मैंने कहा —
शुक्रिया... उड़ो तुम ही वहाँ तक
उड़ान भर सकती हो जहाँ तक
और उड़ गई मेरी वह देवदूती प्रेरणा
मेरी लम्बी शिकायती चिट्ठी के साथ।

पर अगले दिन वह लौट आई
ख़ुदा के चौथे सचिव ने जवाब दिया था उसे
ओबैद नाम का एक आदमी
वहाँ नीचे
खड़ा है अपनी इसी शिकायत के साथ
जो अरबी भाषा में लिखी हुई है ।

चौथे सचिव ने कहा था —
अबे बेवकूफ़ ! तुम भी अपनी शिकायत
अरबी भाषा में लिखो
यहाँ लोग कुर्दी भाषा नहीं जानते
इस भाषा में
ख़ुदा तक नहीं पहुँच पाएगी
तुम्हारी शिकायत ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : अनिल जनविजय

16 मार्च 1988 को इराकी कुर्दों के ख़िलाफ़ एक अभियान में सद्दाम हुसैन की सेना ने हलाब्या में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया था, जिसे मानव-इतिहास में सबसे बड़ा क़त्लेआम माना जाता है।