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जहर / नवीन ठाकुर 'संधि'

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कठोर धूपोॅ में टपकै छै पसीना,
कोमल कली जैन्होॅ कुम्हलावै छै हसीना।

गाछी विरिछोॅ लग भी हवा रोॅ चलै छै लहर,
लागै छै प्रकृति नें हवा में घोरलेॅ छै जहर।
गाँव-मोहल्ला कसवा रहै कि शहर,
सब्भैं चीजों पर ढाहै छै कहर।
होय छै हराम सब्भै रोॅ जीना,
कठोर धूपोॅ में टपकै छै पसीना।

कैंन्हें उत्पात मचैलेॅ छोॅ प्रकृति,
बांकी की बचलै पूरलै सब रोॅ गति?
एत्तेॅ दिन राखल्हेॅ तोंही गोॅद में,
माय-बेटा रोॅ रिश्ता नय तोड़ोॅ प्रतिशोध में।
अबकी ‘‘संधि’’ केॅ लोरी सुनाबोॅ बजाय वीणा,
कठोर धूपोॅ में टपकै छै पसीना।