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ज़रूरत के मुताबिक़ चेहरे लेकर साथ चलता है / बी. आर. विप्लवी

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ज़रूरत के मुताबिक़ चेहरे लेकर साथ चलता है
मिरा दमसाज़[1] ये देखें मुझे कैसे बदलता है

कहीं हो एक दो तो हम बुझाने की भी सोचेंगे
यहाँ हर गाम में शोले हैं सारा मुल्क़ जलता है

इसे अब खेल गुड्डे गुड़िया का अच्छा नहीं लगता
फ़क़त बारूद और बन्दूक से बच्चा बहलता है

हमारी टूटी छत पर धूप भी बरसा गई पानी
ये मौसम 'विपल्वी' के साथ कैसी चाल चलता है

शब्दार्थ
  1. मित्र