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ज़िन्दगी के बराबर / इमरोज़ / हरकीरत हकीर

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कुछ दिनों की मैं उस को
देख-देख सोच रही हूँ
वह छोटा-छोटा लग रहा था, वैसे ही
उस ने ज़िन्दगी में मुझ जैसा
कुछ देखा नहीं था
इक दिन मैं घर में भी और कमरे में भी
अकेली थी
उसे पास बिठा कर कहा
तुम भी दुनिया देख आओ
अगर फिर भी तुझे मेरी जरुरत हुई
तो फिर ठीक है तुम जो भी कहोगे
मुझे देख कर मेरे बोल सुन कर कर
वह उठा
उस ने मेरे सात चक्कर लगाये
और आकर हँसता-हँसता
मेरे पास बैठ गया, बोला -
देख ले मैं दुनिया देख आया हूँ
यही दुनिया थी मेरे देखने लायक
मैं उसे देख-देख उसके हँसते- हँसते
बोलों को देख सुन हैरान रह गई
वह छोटा नहीं था
वह तो मेरे ही सात चक्कर लगा कर
मेरे बराबर का भी हो गया है
और ज़िन्दगी के बराबर का भी...