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ज़िन्दगी जंग का मैदान बन गई / बाल गंगाधर 'बागी'

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मनु जब राह से, हमारे लोग चलते थे
तब उनके बदन पे, झाड़ू व मटके बंधते थे
भूख प्यास से मरते थे, वह धूप में कैसे
क्योंकि रात या, दोपहर में निकलते थे

इंसान की परछाइयां, बर्दाश्त नहीं होती थीं
कुदरत की रचना पे, मुंह फाड़-फाड़ हंसते थे
दलित इंसान थे, क्या यह गुनाह था उनका
जिनकी गुलामी पे ब्राह्मण, मस्त मगन रहते थे

मिर्ची-सी धूप और बर्फीली रातों में भी
हमारे लोगों के तन पे, फटे चिथड़े रहते थे
ख्वाबों की बात क्या, हकीकत का फसाना है
कैसे दलित ज़िन्दगी, बोझ सी ढोके मरते थे

इंसान मारने का हुनर, तुमने कहाँ पर सीखा
डरे नहीं हम इसलिये, तुमसे लड़ा करते थे
माँ की आंचल पर जुल्म, तसव्वुर बदल दिया
ब्राह्मण इतनी नीची, हरकतें कैसे करते थे