भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

ज़ीमा जंकशन (भाग-1 / येव्गेनी येव्तुशेंको

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हम ज्यादा ईमानदार होते हैं
जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है
वही कुछ चीज है
और ये वस्तुगत परिवर्तन सम्प्रेषित होते हैं
मुझ तक और मेरे परिवर्तनों तक
भाषा की तरह।
यदि रास्ता मैं तुम्हें देखता हूँ जो अब नहीं है रास्ता
जिस पर हमने तुम्हें देखा था एक बार
तुममें जो अब देखता हूँ यह है नया
यह अपने आप की खोज थी जिसे मैंने पाया
महसूस करता हूँ कि मैं बीस वर्ष पहले से
ज्यादा समझदार हूँ: लेकिन संघर्ष के लिए
जो मैंने कहा और जो मुझे कहना चाहिए
कहना चाहिए था और चुप रहा।
अक्सर मेरा जीवन पिछड़ी बस्तियों में बीता
कुछ व्यक्तिगत विचार-भावनाएं या इच्छायें
जीवन में अब तक आये मोड़ और प्रकरण
कुछ प्रचुर प्रेरणायें
कुछ भी खत्म नहीं हुआ
यहाँ तक रोज सार्थक और नये आकार के लिए
नई शक्ति उस मैदान को छूती हुई
जहाँ तुम पहले पहल नंगे पांव घूमे, धूल को ठुकराते हुए
मैं अक्सर इस साधारण विचार पर विश्वास करता हूँ :
कि बायकाल झील के पास मेरा अपना कस्बा
मेरा इंतज़ार कर रहा है।
और चीड़ों को दुबारा देखने की इच्छा
समय और फासलों के गूंगे गवाह
जन उभार के बाद अपने महान पितामह
और अन्य लोगों के निर्वासन में
यहां विरासत से दूरियों
की अधिकता
कीचड़ और वर्षा में शिशुओं और गृहणियों के होते हुए
झितोमिर प्रदेश के उक्राइनी किसान
पेड़ों पर मकड़ी के जाल
भूल जाने के लिए
भटकावों में धैर्य खोजते हुए
उनमें से हरेक एक-दूसरे को अपनी जिंदगी से
ज्यादा प्यार करता था।
हाथों की उलझी हुई नसों के साथ
चौकीदारों ने असामान्य आँखों से देखा
बैठकों में मशालें जलती थीं
और सार्जण्ट आग के उजाले में खेलता था
मेरे महान पितामह रात-भर वहाँ बैठकर सोचते रहते
और अपनी मेहनती उँगलियों से
धधकते अंगार को पकड़ कर
पाइप सुलगाते थे
उन्होंने क्या किया सोचकर
अब उन्हें दिखता होगा।
अपरिचित इलाके में पहुँचते हुए
आत्मीयता या अलगावμईश्वर जानता है
उन्होंने यकीन नहीं किया
प्रचलित और मनगढ़न्त किस्सों पर
जो साधारण लोग रहे वहाँ राजकुमारों की तरह
कौन-सा समय था
(जब लोग राजकुमारों की तरह रहे हों)
और यकीन नहीं किया अपने आकस्मिक विचारों
और चिन्ताओं पर
जोतना और बोना था
प्रतिबंधित उसी तरह रहने के लिए जहाँ तक मिट्टी थी
तुम अपने आपको खोजोगे
जब तुम वहाँ रहोगे कैदी की तरह
जहाँ पहुँचने से पहले तुम मीलों हरियाली घूमते थे
और कहाँ है उक्राइना
माँ उक्राइना!
जो बुलबुल को ढूंढ़ सकती है
जहाँ वह अपने आरम्भिक गीत गाती है
उस तक पहुँचने के लिए
चारों और फैले अभेद्य जंगल
कहीं से भी रास्ता नहीं
न घूमते हुए
न घुड़सवारी करते हुए
न भटकते हुए
न कुलाचें भरते हुए
न उड़ते हुए
शेष छटपटाती हुई औपनिवेशिक मजदूर बस्तियाँ
(मानता हूँ) इस विदेशी लगने वाले भू-भाग को
अपने भाग्य की तरह
हरेक के लिए अपनी अप्रसन्नता
किसी की सौतेली माँ कहाँ तक सहृदय होगी
नहीं हो सकती माँ जैसी
उन्होंने उँगलियों में इसकी मिट्टी को टटोला
इसका पानी पिया और प्रश्न किया, समझा, निर्वाह किया
और बच्चों को पीने दिया
और उनके लिए खून के रिश्ते से बाँध दिया
गुलामी और गरीबी का जुआ फिर से रख दिया
वह कटु अनुभवों वाला जीवन
कोई आरोप नहीं लगा सकता कि
एक बूढ़ा नाखून दीवार को छील रहा है
पीटा जा रहा था कुल्हाड़े के बेंट से।
बहुत कठोरताएँ थीं
जिंदा रहने की चिंताएँ, उनकी
मेहनती पीठ को उन्होंने जब जितना झुकाया
वह हमेशा बाहर की ओर झुकी
उन जैसा होने के लिए नहीं
जिसने रोटी खाई
वह रोटी थी जो खा गई
लावनी करते हुए, मण्डाई करते हुए
खलिहानों में, खेतों में, घरों में, भूसे में
वहाँ पर्याप्त सच है जहाँ पर्याप्त रोटी
रोटी खोजो और सच अपने आप मिलता है
कमजोर विचार!
मेरे पितामह जीवन-भर भूख से जूझते रहे
फसलों की असंख्य खराबियों में
उन्होंने इस बारे में सोचा हो
या न सोचा हो
लेकिन सच घटित हुआ।
पितामह के पास करने को अधिक न था
कुछ नया था जिसमें हम थे
1919 में नौ वर्ष की उम्र में
मेरी माँ के साथ अचानक यह घटना घटी
शरद के एक दिन बन्दूक का धमाका
अंधड़ की तरह फूटा
यकायक पहाड़ों की ओर से
एक नौजवान घोड़े की गरदन पर झुका
लगाम थामे
ज़ार की सेना का एक सिपाही
जिसके टोप पर तारा था
बिजली की तरह दौड़ती सेना
और चरमराता हुआ पुराना पुल था उसके पीछे
घुड़सवार ही घुड़सवार थे चारों और
भालों की चमक से थरथराता हुआ जंकशन
कुछ प्राप्य और खूबसूरत था इस घटना में
वहाँ कोई सैनिक न था जब कोमिसार आये
और कुछ था इस हास्यास्पद अनुकरण में
शत्राुओं के क्लब-रूम चूल्हे के पास
और कुछ था उस युवा घुड़सवार में
तम्बू में उन्मत अपने सैनिक बूटों को पालिश करता हुआ
उसने स्कूली लड़की से गहरा प्यार किया
आवेश में इर्द-गिर्द घूमते हुए
वह उससे हर विषय पर बात करता था
लेकिन अधिकतर दुनिया के बारे में
दुनिया के भयानक पक्ष के बारे में
और अपने उग्र विचारों से
(जो कि उसके समूह का विचार था)
हथियार की तरह वार करता था
विचारों के अलावा उसे कुछ मान्य न था
रोटी भी नहीं
रोटी के नरक में -- उसने कहा
पूर्ण स्वाभिमान के साथ
(इसे मुट्ठियों और उद्धरणों से पुष्ट करता हुआ)
हमारे पास केवल यही चीज थी
बुर्जुआजी को समुद्र में धकेलने के लिए।