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ज़ीमा जंकशन (भाग-6 / येव्गेनी येव्तुशेंको

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ओह, मेरे मामाओ !
ओह, मेरे लोगो !
कितनी गरिमा थी जब तक पड़ोसी
मेरे पास आया
‘आन्द्रेइ’, उसने कहा,
‘और ड्राइवरों में से एक’ पत्नियाँ
‘तुम मामी को थोड़ा-सा इशारा कर सकते थे
लेकिन तुम क्यों करते’
वह जानती है
वलोद्या के एक अच्छे कारीगर को
लेकिन वह पियक्कड़ है
सारा कस्बा जानता है इस बात को
उसने चोट की मुझ पर लकड़हारे की तरह
मैंने किंचित रुचि ली
मैंने ऐसा नहीं किया
लेकिन उस दौरान मेरा छोटा मामा
अपने आप गायब हो गया कहीं
लोग आते रहे समय-समय पर
चीज़ों की माँग करते हुए
खिलौनों और सोफों की मरम्मत करवाने के लिए
वे बोले
‘वह हफ्ते के लिए बाहर है, कारीगर’
और तब पड़ोसी ठठाए
गेट से नुकीली नाक सिंकरते हुए
‘वे तुम्हारे सामने लज्जित हैं जेन्का:
वह छोकरा खुद बाहर है, तुम्हें सबक लेना चाहिए
मेरे प्रिय छात्रा, तुम्हें जिंदगी से सीखना चाहिए ।
घर की लड़की की तरह
स्टोर में ले गई वह मुझे, जहाँ मेरे मामा लेटते हैं
कच्छे में शराब के भभकों में
गलत धुन में ‘याबलाका’ गाने की कोशिश करते हुए
उन्होंने हमें देखा और आधे उठे
सकपकाए सादे और दुखी दिखते हुए
और धीरे से बोले, ‘ओ मेरे प्यारे जेन्का,
क्या तुम जानते हो कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ’!
मैं दुखी हुआ
मुझे धक्का लगा
इसलिए मैंने घर में खाना छोड़ दिया
और शहर के कहवाघर में गया अकेला
गर्मी की गरम साँसें थीं
शहर के कहवाघर में
और पिछवाड़े घिघियाते-रिरियाते सुअर थे
टट्टी के डिब्बे, चेहरे
फड़फड़ाते रद्दी कागज़ थे खिड़कियों पर अटके हुए
आँखें मींचता हुआ अध्यापक
मेनू पलटता हुआ
शोरबा पीती हुई खेतिहर लड़की
मोटा लकड़हारा
गिलास और काली बाँह से काँटा पकड़ा हुआ दण्डनायक
बहुत शोरगुल था शहर के कहवाघर में
या सरसराती आवाज़ थी
थिरकती महिला वेटरों की
चाय के गिलास, बहस के मौके पर
चश्मा पहने मोटे चेहरे वाला एक व्यक्ति
यकायक बातचीत में डूब गए हम
बहुत बुद्धिमान लग रहा था वह
मास्को का पत्राकार बताया उसने अपने को
वह ज़ीमा जंकशन पर आलेख लिख रहा था
मैंने उसे पहले एकपक्षीय स्थापनाओं और
उलझी हुई गहन गुत्थियों के बारे में बताया
और संकोचों की जटिल ईमानदारियों के बारे में
वह खरीद रहा था मेरे लिए
कार्न रसबेरियों से बनी हुई वोद्का
और तम्बाकू का धुँआ छोड़ते हुए उसका जवाब था
‘मेरे प्यारे भोले नौजवान,
मैं ऐसा चाहूँगा जैसे कि मैं अपने आप हूँ
हमेशा विस्मय में कि क्या कहाँ से आया
और सोचते हुए मैं हर चीज का इंतज़ाम कर सकता हूँ
हमेशा विश्लेषण करते हुए और लड़ते हुए
व्यक्तिवाद से अलग
नए समय के निर्माण की कोशिश करता हुआ
मैं ठीक था, हाँ और था उत्साही
और समय नहीं रहा मेरे पास
उदास रहने के लिए
जब तक कि उदासी मेरी ज़रूरत न रही हो
यह सही है कि बाद में
मैंने उपन्यास लिखा जो प्रकाशित नहीं हुआ
और वह मेरे परिवार के पास रहा
ठीक है कि तुम्हें जीना पड़ता है
अब मैं एक औज़ार हूँ
यहाँ बहुत कुछ बेहूदा है
वह होश में नहीं है, वे कहते हैंμ
‘लिख नहीं रहा अब, क्या है वह लेखक’
उसके लेखन में दम नहीं
वह अभिभावक है, सरंक्षक है
जैसे कि उसके विचार जनता की धरोहर रहे हों
ओह यहाँ परिवर्तन हैं लेकिन भाषणों के बाद
जहाँ भी जो कुछ कहा गया सार्वजनिक रूप से
यह चिंता बीते हुए समय की चुप्पी है
और चुप्पी बीते हुए समय की घटनाएँ
नपे-तुले क्षणों और उनके दुहरावों में
(मैंने कुछ नहीं पाया)
अविश्वास के अलावा
अविश्वास! विश्वास करना प्यार करना है
हताश मोटे व्यक्ति के साथ
उसने खाना खाया, सुस्ताया होंठ चटकारे
बैयक्तिक स्तर पर आत्मतुष्ट, अप्रासंगिक
प्यार या विश्वास के खिलाफ वह अधेड़।
‘ओह मैं भूल रहा था आलेख के अंश को
कारखाना देखने के बाद मुझे एकांत चाहिए
समय बीत रहा था
कितना गंदा बना है यह खाना, बहरहाल
आखिर यह सब क्या है, कोई क्या उम्मीद कर सकता है!
उसने मुँह कागज से पोंछा
और मेरी ओर त्यौरियाँ चढ़ाई, ‘ओह हाँ
इत्तिफाक से कहाँ है वह जगह जहाँ से तुम आए’ उसने पूछा
‘माफ कीजिए मुझे याद नहीं’
वह सकपकाया,
मुझसे और दूसरों से
नमस्ते किये बिना
वह झल्ला कर दरवाजे से बाहर चला गया।
मैं रुचि और अनिर्णीत स्थितियों के लिए
अन छुए जंगलों में घूमता रहा
और सुनता रहा चीड़ों के नोकदार गाछों की साँय-साँय
आन्द्रेई ने कहाμसिर्फ तुम्हारी चिंता थी मुझे
बेवकूफ लड़के, आओ, हमारे साथ चलो
वहाँ ईर्कुत-इर्कुतस्क का संगीत कार्यक्रम है
टिकट है और बहुत लोग आएँगे
देखो कैसी सलवटें पड़ी हैं तुम्हारे पायजामे पर
और आश्चर्य में अकेला था मैं
सादे कपड़े पहना हुआ
कमीज़ पहना
जिसमें लोहे की गर्मी बाकी थी
अपने प्रसन्न मामाओं की बगल में
कदम बढ़ाता हुआ
उन्हें बहुत चिंता थी
अपने पालिश किए हुए जूतों की
तेल-फुलेल की खुशबू की
एक मनुष्य की आकृति थी इश्तिहार पर
रूसी नायकः अन्तोन व्यसपेतनिख़
जो काम कर रहा था
तनाव में आकर्षक ढंग से
कुछ वज़नदार चीजों को दाँतों के बीच से छोड़ता हुआ
नुकीले धारदार टुकड़ों के ऊपर वह
वॉयलिन की धुन पर नाचा
उसने बोतलों के करतब दिखाए
ढक्कन फेंके
और कुशलता से बूँद-बूँद खाली किया उन्हें
उसने उत्साह से फहराए रूमाल
और इक्ट्ठा बाँध दिए
काढ़ दिया एक फाख़्ता और उपेक्षित सदाबहार
पत्तों का गुच्छा
-- प्रदर्शन का वैचारिक चरम
‘ट्रिक है यह’ मामा खुश थे
अच्छा हैμ‘देखो! देखो!’
और मैं!
हल्की तालियाँ बजाई मैंने भी
अन्यथा नाराजगी का शिकार हो सकता था मैं
व्यसपेतनिख घूमता रहा
अपने बाजुओं का प्रदर्शन करता हुआ
रात के अंधेरे में आए हम बाहर
‘मेरे अच्छे बच्चे’, इसके बाद क्या सोचा तुमने ?
लेकिन एकान्त चाहिए था मुझे कुछ देर के लिए
‘मैं कुछ दूर घूमने जा रहा हूँ’ याद रखना तुम जानते हो
पूरा कुनबा घूम रहा है
तुम कभी नहीं रहे घर पर
मजाक नहीं है जैसा तुम कर रहे हो ।
अकेला घूमता रहा मैं चुपचाप
विचारों के मैदान में
वहाँ बुलंद फन्तासियाँ नहीं थीं
और समारोह क्या है
लेकिन उनमें से मैंने बहुत से ऐसे देखे
अच्छा, इस ख़ातिर शुभ कामनाएँ ।
ऐसी बहुत-सी पुरातन उपलब्धियाँ
आर्थिक दृष्टिकोण से हीन ऐसी चापलूसियाँ
पर्दों पर वाह-वाह लूटते चल-चित्र
जबकि जौ नहीं मिलते तुम्हें शोरबे के लिए
यथार्थ और अयथार्थ को आंकते हुए --
झूठे के साथ हैं
सच के बदले हुए रूप, मैं यह भी सोचता हूँ कि
अपराधी हैं हम
छोटी महत्वपूर्ण गुस्सैल कविताएँ
उबाऊ असंख्य उद्धरण और वैज्ञानिक निष्कर्ष
ये लम्बे प्रत्यावर्तन हैं --
दो श्रेणियाँ हैं प्यार करने वालों कीμ
संक्षेप में एक जो किसी खतरे के तहत
चापलूसी करते हैं
चालाकियों में माफ हो जाते हैं
और उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ प्यार को खत्म कर देती हैं
इसके बाद वह दृढ़ता जिसे हम विकसित करना चाहते हैं
बहुत है हमारे इन दिनों में
आत्म-अंध प्रेम का अर्थ कुछ नहीं है अब
लेकिन प्यार का फलक चिंता और मूर्त विचारों के लिए
सही विस्तार और पहाड़ों के प्रत्यावर्तन हैं
गहराइयाँ स्वीकार करती हैं कि कुछ नहीं हैं आफतें
जो छद्म नहीं और छद्म हो सकता है
लेकिन मानवीय अविश्वास का अपकर्ष होता है यहाँ
मैं प्रशंसा नहीं ही कर सकता
जो कमजोर हैं और गलत नहीं हैं
जो रूस की नीतियों का आदान-प्रदान कर सकते हैं
बहस के दृष्टिकोण से
ये चिंताएँ कमजोर से ताल्लुक रखती हैं
उनके सहज और मुश्किल जीवन से
उदात्त और महान क्या है जिसके लिए रूस
इंतज़ार कर रहा है मेरा
यह कमजोरी नहीं है
और साहस मेरी महत्त्वकांक्षा है
छोटे से छोटे सच की
साधारण चिनगारी को क्रियान्वित करने से
मैं पीछे कभी नहीं हटूँगा
ओह हर जगह, ओह बढ़ते हुए कदमों के ऊपर
ठहरी हुई धुंधली रेत
सिर के ऊपर है मेरे
झण्डे फरफरा रहे हैं
कामगार साथ हैं जिस जंगल में घूम रहा हूँ
उत्साहहीन संकोचों का जागरण
अविश्वास नहीं तल्ख़ प्यार
सच के नाम पर मैंने
ये प्रति-श्रुतियाँ बनाई हैं
और उनके नाम पर जो इनके लिए
मर-मिट गए
जीवन नहीं रह सकता
हवाओं की रिक्तताओं में
सवालों के कारणों की पड़ताल
महान है अपने आप में यह आवाज
आत्मविश्वास
और सम्यक समाधान ।