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ज़ीस्त उम्मीद के साये में ही पल जाए फिर .../ श्रद्धा जैन

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सर से पानी जो कभी अपने निकल जाए फिर
बुज़दिली अपनी भी हिम्मत में बदल जाए फिर

धूप आने के कुछ आसार तो दिखलाई पड़े
ज़ीस्त[1]उम्मीद के साये में ही पल जाए फिर

पूछ ले हाल हमारा कभी वो भूले से
ज़िंदगी ठोकरें खाती है सम्हल जाए फिर

फ़र्ज़ दुनिया के निभाने में मेरा दिन गुज़रे
और हर रात तेरी याद में ढल जाए फिर
   
वो कहे गर तो खिलौनों की तरह बन जाऊँ
कुछ नहीं और, तबीयत ही बहल जाए फिर

शब्दार्थ
  1. ज़िंदगी