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ज़ेनिया एक-14 / एयूजेनिओ मोंताले

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वे कहते हैं कि मेरी कविता में किसी के प्रति कोई लगाव नहीं है
किन्तु अगर उसमें तुम्हारी उपस्थिति है, तब किसी के प्रति तो हुआ ही;
तुम हो मेरी कविता में : तुम, जो रूपाकार से परे जाकर
अहसास में बदल गई हो ।
वे कहते हैं कि कविता अपनी चरमावस्था में
उस सबको महिमामंडित करती है, जो दूर जा रहा है,
वे कहते हैं कि कछुआ बिजली से अधिक द्रुतगामी नहीं है,
अकेले तुम्हीं को पता था कि गति और गतिहीनता एक ही चीज़ है
कि शून्य ही पूर्णत्व है और निरभ्र आकाश
अपने सर्वोच्च बिन्दु पर धुँधला हो जाता है ।
अतः बंधनों और साँचों से सीमाबद्ध तुम्हारी लम्बी यात्रा
मुझे अधिक संगत प्रतीत होती है ।
तब भी, यह जानते हुए भी कि हम एकप्राण थे—
भले एक शरीर में या दो में, मुझे शान्ति नहीं मिल पाती ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल