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ज़ेनिया एक-6 / एयूजेनिओ मोंताले

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तुमने गद्य या पद्य रचकर
अपने निशान छोड़ जाने की बात
कभी नहीं सोची,
यह तुम्हारी ख़ूबसूरती थी
और बाद में मेरा आत्मधिक्कार ।

यही बात मुझे डराती भी थी
कि किसी दिन तुम मुझे
’सुखी नगर के दुखी कवियों’ के
टर्र-टर्र से भरे जोहड़ में धकेल दोगी ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल