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जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता / शाद अज़ीमाबादी

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जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता
हमें भी देखना है नामा-बर कब तक नहीं आता

पहुँचना था जो अर्ज़-ए-हाल को अर्श-ए-मुअज़्ज़म तक
कई शब से वही नाला मिरे लब तक नहीं आता

दिल अपना वादी-ए-ग़ुर्बत में शायद मर रहा जा कर
न आने की भी इक मीआद है कब तक नहीं आता

वहाँ औरों के क़िस्सों को भी सुन कर वो खटकते हैं
यहाँ अपनी ज़बाँ पर हर्फ़-ए-मतलब तक नहीं आता

यहाँ तक सीना-तंगी से ज़ईफ़ ओ ज़ार है नाला
चला जो सुब्ह को वो ता-ब-लब शब तक नहीं आता

जहाँ तम्हीद की वो और क़िस्से छेड़ देता है
किसी सूरत से ज़ालिम हर्फ़-ए-मतलब तक नहीं आता

बुला भेजें न जब तक ‘शाद’ को वो अपने कूचे में
इजारा है तिरा ऐ शौक़ हाँ तब तक नहीं आता