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जिन्दा हैं हम / स्वाति मेलकानी

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जिन्दा हैं हम
और जिन्दा रहते हैं
तब तक
जब तक मर नहीं जाते...
तब
जब तक एक क्लर्क
मुँह में पान दबाए
चाय-पानी का खर्चा माँगता है
और मेज के नीचे से हम
नोट बढ़ाते हैं
जब पड़ोस में शराबी की बीवी
रात को पिटती है
और हम खिड़की बन्द कर लेते हैं...
जब बस में
किसी शरीफ आदमी के
बगल में बैठी लड़की
असहज होती है
जब एक भीड़ भरी बस में
हम सीट लपक लेते हैं
और
एक बीमार बुढ़िया खड़ी रहती है...
हाँ, हम जिन्दा होते हैं
तब भी
जब होटल में खाने के बाद
एक नौ साल का लड़का
जूठी प्लेट उठाने आता है
या उससे दो साल छोटा या बड़ा
दूसरा लड़का
पीठ पर थैला टाँगे
कूड़े के ढेर में
कुछढँूढ रहा होता है
इस सबके बीच
हम जिन्दा होते हैं
और बिजली की खुली लाइन में
टाँका फँसा कर
रोशनी में रहते हैं
चारों तरफ देख कर
झट से एक थैला
सड़क पर फेंक देते हैं...
हम जिन्दा होते हैं
जीने के सभी लक्षण हम में मौजूद हैं
हमें भूख लगती है
और हमारी साँस भी चलती है
हम देश की राजनीति पर बहस करते हैं
अफगानिस्तान की आन्तरिक व्यवस्था पर
राय देते हैं
नेपाल में राजशाही का विरोध करते हैं
अखबार पढ़ते हैं
समाचार सुन कर हमें गुस्सा भी आता है
हम अमेरिका और सरकार को गालियाँ देते हैं
हर जिन्दा प्राणी की तरह...
हममें जीवन के सभी लक्षण मौजूद हैं
और दिन भर जी लेने के बाद
रात को
हमें
आती है नींद भी गहरी...