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जिसके कण्ठ से पृथ्वी के सारे वृक्ष एक साथ कविता पाठ करते थे / उदयप्रकाश

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मिगुएल हर्नान्देज़ ऐसा कवि नहीं था , जैसा हम अक्सर अपने आसपास के कवियों के बारे में जानते-सुनते हैं. उसका जीवन और उसकी कवितायेँ , दोनों के भीतर संवेदना, अनुभव और विवेक की ऐसी सच्ची और तनावग्रस्त व्याकुल मानवीय आवाजें थीं, जो आज भी उसकी कविताओं को पढ़ते हुए हमें भीतर से बाहर तक हिला देती हैं. उसके आक्रान्त जीवन और उसकी आहत कविताओं के बीच कोई फांक नहीं थी.

मिगुएल का जन्म ३० अक्टूबर, १९१० में दक्षिणी स्पेन के एक छोटे-से गाँव ओरिहुएला के एक गरीब परिवार में हुआ था. उसके पिता भेड़-बकरियां चराने वाले गडरिया थे. उनके सात बेटों में से जीवित बचे दो बेटों में से एक मिगुएल था. बाकी बच्चों की असमय मृत्यु का कारण भूख और कुपोषण था. मिगुएल भी अपने ३१ साल के जीवन के अधिकाँश वर्षों में पिता की तरह भेड़-बकरियां ही चराता रहा. यह अकेलेपन और मेहनत से भरा उकताने वाला काम था. ११ साल की उम्र में उसे पढाई का मौक़ा मिला, जहां उसने थोड़ा-बहुत लिखना और पढ़ना सीखा. बस, इसी के साथ ही उसने कवितायेँ लिखने की शुरूआत की. स्कूल में अपने सहपाठियों की तुलना में वह सबसे अधिक गरीब था इसलिए वह कभी भी उनसे सहज नहीं हो पाता था. घर पर भी उसके पिता किताबों के प्रति मिगुएल के लगाव को देख कर गुस्सा होते थे. मिगुएल रात में, दिन भर बकरियां चराने के बाद , किसी कोने में छुप कर , किताबें पढ़ता और कवितायेँ लिखता. अगर पिता देख लेते तो उसे पीटते थे. उन्हें डर था कि अगर मिगुएल किताबों में रम गया, तो भेड़-बकरियों वाली उनकी आजीविका का क्या होगा ? नतीज़ा , १४ वर्ष की उम्र में ही उसे पढाई छोड़नी पड़ी और इसी के बाद, जंगलों में अपनी भेड़ों की झुण्ड को चराते हुए उसने स्पेनिश साहित्य का स्वर्णयुग कहे जाने वाले दौर के साहित्य, नाटक और कविता का अध्ययन किया.

मिगुएल की पहली कविता एक स्थानीय अखबार में छपी थी. जब तक उसकी उम्र लगभग २१ वर्ष के लगभग हुई, तब तक वह पूरे प्रान्त में लोकप्रिय हो चुका था. अपने चरवाहा पिता के मना करने के बावजूद वह कवि के रूप में अपनी किस्मत आजमाने स्पेन की राजधानी मैड्रिड चला आया. राजधानी के अमूमन सभी जानेमाने कवि, जिनमें आक्टोवियो पाज़ , फेडेरिको गार्सिया लोर्का , पाब्लो नेरुदा, राफाएल अल्बर्ती आदि शामिल थे, उसके बारे में जान चुके थे और उसकी कविताओं से प्रभावित थे. लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी मिगुएल को राजधानी में कोई नौकरी नहीं मिली और जब वह निराश हो कर अपने घर लौट रहा था , तब रास्ते में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया क्योंकि मिगुएल के पास कोई आधिकारिक पहचान-पत्र नहीं था. उसके पिता ने किसी तरह, अपने गडरिया समुदाय से चन्दा मांग कर, उसकी जमानत ली.

गाँव में रहते हुए भी उसने अपनी पढाई-लिखाई नहीं छोड़ी और वहीं से अपने एक दोस्त रामोन सिये की सहायता से एक लघु पत्रिका –‘दि रूस्टर क्राइसिस’ प्रकाशित करना शुरू किया. यहीं उसका पहला कविता संग्रह –‘एक्सपर्ट इन मून्स’ प्रकाशित हुआ, जिसे पढ़ कर स्पेन के सुप्रसिद्ध और महान कवि फेडेरिको गार्सिया लोर्का ने उसे पत्र लिखा. इसी समय उसने एक सुन्दर , आकर्षक लड़की जोसेफिना से बेइंतहा प्यार किया. जोसेफ़िना के पिता एक फौजी अफसर थे. यह प्यार और आगे चल कर जोसेफिना से उसका विवाह मिगुएल के जीवन का एक बहुत त्रासद अध्याय सिद्ध हुआ.

१९३४ में मिगुएल दुबारा मैड्रिड आ गया. इस बार उसे वहां एक प्रकाशक के यहाँ एक छोटी-सी नौकरी मिल गयी. वह मैड्रिड में रहते हुए जोसेफ़िना को पत्र लिखता रहा. अपनी प्रेमिका के प्यार में उसने बहुत सी अप्रतिम प्रेम कवितायेँ इस दौर में लिखीं. इस बार मैड्रिड में वह लोर्का, नेरुदा, पाज़ जैसे बड़े कवियों के निकट संपर्क में आया.

१९३६ के आते ही घटनाओं ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया. शहर के पार, एक गरीब बस्ती में रहने वाले मिगुएल को फिर से पुलिस ने अपनी पहचान के लिए पर्याप्त आधिकारिक दस्तावेज़ न होने के आरोप में गिरफ्तार किया. थाने में उसे बुरी तरह मारा-पीटा गया और शारीरिक यंत्रणाएं दी गयीं. किसी तरह पुलिस चौकी से उसने सुविख्यात कवि पाब्लो नेरुदा को फोन किया , जो उस समय मैड्रिड में चिली के राजदूत थे. नेरुदा के फोन करने पर उसे पुलिस थाने से छोड़ दिया गया. इस घटना के बाद मिगुएल ने एक नाटक लिखा : ‘El Labrador de mas aire’ (एक बहुत महत्वपूर्ण देहाती / ‘एक वीआईपी गंवार’).

जुलाई १८, १९३६ से हालात बिगड़ गए. बर्बर तानाशाह फ्रांको की अगुआई में गिरफ्तारी और गोली मार देने की घटनाएं बढ़ने लगीं. फेडेरिको गार्सिया लोर्का जैसे महान कवि को, जो मैड्रिड से भाग कर अपेक्षाकृत शांत शहर अंदालूसिया चला गया था, उसे गिरफ्तार कर लिया गया और ग्रानाडा में उसे गोली मार दी गयी. नेरुदा ने लिखा है : ‘जो क्रूर मानवघाती फासिस्ट स्पेनिश भाषाई जनता के ह्रदय में गोली मारना चाहते थे , लोर्का को मार कर उन्होंने सटीक निशाना चुना है.’ (कुछ-कुछ ऐसा ही हम अपने देश में महात्मा गांधी की ह्त्या के बारे में कह सकते हैं. ३० जनवरी १९४८ की वह हत्यारी गोली, वास्तव में समूची भारतीय जनता के हृदय पर दागी गयी गोली थी.)

फासीवादियों और लोकतंत्र समर्थकों के बीच युद्ध शुरू हो चुका था. मिगुएल भी एक सिपाही की तरह इस युद्ध में शामिल हुआ. युद्ध और हिंसाओं के बीच जोसेफ़िना और उसके बीच प्यार गहराता गया. १९३७ के हिंसा से आक्रान्त उथल-पुथल भरे समय में दोनों ने विवाह किया. विडम्बना इससे बड़ी क्या होगी कि जोसेफिना के पिता दुश्मन सेना के अफ़सर थे, जिसके खिलाफ उनका दामाद मिगुएल प्राणपन के साथ, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता को बचाने की लड़ाई लड़ रहा था. इसी दौरान मिगुएल-जोसेफ़िना ने अपने पहले पुत्र मैनुएल रामोन को जन्म दिया, जो कुपोषण, चिकित्सा के अभाव और युद्ध की कठिनाइयों के बीच जल्द ही मर गया. युद्ध ने मिगुएल की कविताओं को पूरी तरह से बदल डाला, जिसका प्रमाण उसकी बाद की दो किताबों में मिलता है, जो क्रमश: १९३७ और १९३९ में प्रकाशित हुई. इस संघर्ष के दौरान मिगुएल हर्नान्देज़ ने ऐसी कवितायेँ लिखीं हैं, जो स्पेनिश साहित्य का मील का पत्थर कही जा सकती हैं. वह किसान सेना की पहली कतार का सिपाही बना और युद्ध के मोर्चों, रेडियो प्रसारण तथा फासीवाद के विरुद्ध जागरूकता फैलाने वाली प्रचारमूलक कवितायेँ लिखीं. उसने कई नाटक और एकांकियां तथा प्रहसन लिखे, जिनके लिए राफ़ाएल अल्बर्ती ने –‘आपातकालीन रंगमंच’ (Theatre of Urgency) का नाम दिया था.

मिगुएल हर्नान्देज़ को वालेंसिया में आयोजित होने वाले एंटी फासिस्ट राइटर्स कांग्रेस में प्रतिनिधि बना कर भेजा गया. उसे कविता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. उसने मास्को के नाट्योत्सव में भाग लिया. इस प्रतिभाशाली गरीब गडरिया कवि की लोकप्रियता और कीर्ति शिखरों को छोने लगी.

लेकिन मार्च महीने के आख़िरी सप्ताह तक आते-आते मैड्रिड भी फासीवादी तानाशाह फ्रैंको के अधीन हो गया. लोकतांत्रिक मोर्चे की हार हुई. मिगुएल ने स्पेन से भाग कर चिली के पुर्तगाल स्थित दूतावास में शरण लेने की कोशिश की. उसे आशा थी कि पाब्लो नेरुदा के कारण वह आसानी से लिस्बन में शरण पा लेगा. इसके लिए पैसे जुटाने के लिए उसने अपना एकमात्र अच्छा सूट बेचने की कोशिश की लेकिन उसके खरीददार ने ही उसे धोखा दिया और सरहद पार करने के दौरान ही उसे पकड़ लिया गया.

इसके बाद एक-एक कर इस अद्भुत संवेदनाओं वाले कवी को तेरह अलग अलग जेलों में रखा गया. ऐसी संकरी काल-कोठरियों में जहां किसी का आना-जाना भी प्रतिबंधित था. उसके पिता को ज़रूर मिलाने की अनुमति दी गयी, लेकिन भयभीत गडरिया पिता ने अपने बेटे मिगुएल से मिलने से इनकार कर दिया.

कैदी मिगुएल हर्नान्देज़ जेल की अंधेरी संकरी कोठरियों में भी अपने सृजन-कर्म से विरत नहीं हुआ. उसने वहां अपने चीथड़ा हो चुके कपड़ों को फाड़-फाड़ कर, उनकी चिंदियों में कवितायेँ लिखीं. इन्हीं में से वह विख्यात और लोकप्रिय कविता भी है, जो उसने अपने दूसरे बेटे के लिए लिखी –‘प्याज की लोरी’ (‘Lullaby of the Onion’). यह मार्मिक लोरी उसकी सबसे विलक्षण कविताओं के अंतिम संग्रह ‘सोंग्स एंड बैलेड्स आफ अब्सेंसिया’ (‘अनुपस्थिति के गीत और गाथाएं’) में संग्रहीत है.


नवम्बर १९४१ में वह जेल में ही बीमार पडा. उसे टाइफस (तंत्र-ज्वर) ने घेर लिया. उसका शरीर बुखार में तपता रहता था. जोसेफिन को उसने जेल से बहुत ही मार्मिक पत्र लिखे हैं. १९४२ के वसंत के आते-आते उसे टीबी (यक्ष्मा) ने भी जकड लिया. खांसी, सांस लेने में दर्द और खून की उल्टियों के बीच सिर्फ ३१ वर्ष कुछ माह की आयु में इस महान स्पेनिश कवि का अंत हुआ. तारीख थी २८, मार्च १९४२. घड़ी में समय था ५ बज कर कुछ मिनट.

जेल की जिस संकरी-सी खाट पर मिगुएल हर्नान्देज़ ने अंतिम साँसें लीन, उसके बगल की दीवार पर उसने खरोंच कर लिख रखा था :

      “अलविदा, मेरे भाइयो, कामरेड्स, दोस्तो

मुझे अब सूरज और मैदानों-खेतों से छुट्टी ले लेने दो !” जेल के अधिकारियों के मुताबिक़ मृत्यु के बाद भी मिगुएल की आँखें बहुत कोशिशों के बावजूद बंद नहीं की जा सकीं. वे उसकी चौंकी हुईं अबोध आँखें थीं.

नेरुदा ने कहा था : ‘जब हम मिगुएल हर्नान्देज़ की कवितायेँ पढ़ते हैं, तो हमें उसकी कविता में वह संगीत सुनाई देता है , जो किसी मादा भेड़ के अपने छौने को दूध पिलाते समय, उसके थन में से, उसके रक्त के दूध में बदलने की प्रक्रिया में पैदा होता संगीत हुआ करता है.”

आक्तावियो पाज़ ने लिखा है : उसके कविता पाठ के दौरान बीच-बीच में, उसकी आवाज़ में जो सुनाई देने लगता था, वह कुछ अलौकिक था. जैसे कहीं दूर घने बादलों के बीच बिजली कौंध रही हो . या कोई अज्ञात वन्यप्राणी अपनी मृत्यु के ठीक पहले, अपनी डरावनी लेकिन मार्मिक आवाज़ में अचानक चीख रहा हो. या शायद कोई बैल, जो किसी दोपहर, धुंए और कोहरे से बने लोगों की भीड़ के बीच अपनी व्याकुल आँखें उठा कर, उनमें से किसी अपने परिचित को खोज़ता हुआ, दम तोड़ रहा हो और उसके गले से उसकी अंतिम आवाजें निकल रही हों. किसी और कवि ने लिखा: ‘मिगुएल हर्नान्देज़ जब अपनी कवितायेँ पढ़ता था, तो लगता था कि जैसे इस पृथ्वी के सारे वृक्ष किसी एक मनुष्य के कंठ से गा रहे हों.