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जिस्म क्या चीज़ है ये जाँ क्या है / दीप्ति मिश्र

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जिस्म क्या चीज़ है ये जाँ क्या है
और दोनों के दरमियाँ[1] क्या है

इक ख़ला[2] भीतर, इक ख़ला बाहर
फिर मुकम्मल-सा ये जहाँ क्या है

चार दीवार, छत, ज़मीं वालो
है भी मालूम आशियाँ क्या है

चन्द सिक्कों में तुल गए रिश्ते
सूद क्या और अब ज़ियाँ[3] क्या है

रोज़ जुड़ता है इक नया सफ़हा
ज़िन्दगी की ये दास्ताँ क्या है

शब्दार्थ
  1. बीच में
  2. रिक्तता, एकान्त, अकेलापन
  3. हानि, घाटा, क्षति