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जिस घड़ी हमें हँसना था खिलखिला कर / मनविंदर भिम्बर

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जिस घड़ी हमें हँसना था खिलखिलाकर
उस घड़ी हमने अपनी साँसों की आवाज़ को
अपनी मुठ्टी में कस कर पकड़ लिया
और देखते रहे--- सूरज का बेआवाज़ सफ़र
पेड़ों की बेआवाज़ सरसराहट

रह गया तेरे होने का ज़िक्र
बन गया ख़ामोश अहसास
अब तो आदत-सी हो गई है इस ज़िक्र की
क्योंकि ये हर वक़्त साथ-साथ चलता है

कभी ये मेरे दिल में उतरता है
और मुझ से बातें करता है
बात करने का मन हो न हो
यह बात करता है,
तेरे होने की