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जिस दिन से दबा सच कहने का बीड़ा उठाया है / सांवर दइया

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जिस दिन से दबा सच कहने का बीड़ा उठाया है।
हमारे ख़िलाफ़ हर रोज़ नया शगूफा आया है।

न सुन सके भूठ तो आप उठ खड़े हुए लोग वहां,
वे कहते- जलसे में पत्थर हमने फिंकवाया है!

पेट की फटकार सुन सब चल पड़े छीनने रोटी,
वे कहते- उन भूखों को हमने जा उकसाया है।

दाब बढ़ा तो यहां-वहां खुद ही फूट पड़े गुब्बारे,
वे कहते- इस घर में बारूद हमने बिछाया है!

सदियों से सोये समुद्र ने तोड़ डाले किनारे,
वे कहते- हमारी वजह से यह बवाल आया है।