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जीवन क्या है, वक्त की आपाधापी और रिश्तों का ताना बाना है / पल्लवी मिश्रा

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जीवन क्या है, वक्त की आपाधापी और रिश्तों का ताना बाना है,
कभी पगडंडी यह धूलभरी और कभी सफर सुहाना है।

रिश्तों के धागे हैं नाजुक, इन पर गाँठ लगाओ न,
जीवन का मकसद, मानो तो, हर उलझन को सुलझाना है।

प्रेम अगर है तुमको राही खुलकर तुम इजहार करो
प्रेम नहीं पाने का नाम, यह तो देना और देते जाना है।

दौलत-शोहरत की चमक-दमक पर इतना भी इतराना क्या?
कितना भी रोशन हो सूरज, साँझ पड़े ढल जाना है।

मन की झूठी शान की खातिर अपनों को ठेस लगाओ न
बस एक कदम बढ़ा कर देखो हर दूरी का मिट जाना है।

नफरत के सागर में देखो, जज़्बात कहीं ये डूब न जाएँ
आज इन्हें गर बचा सके न, हर पल कल पछताना है।

जो आज है कल वह नहीं रहेगा, इस सच्चाई से मुँह मोड़ो न
हँसी-खुशी जो गुजर गय पल, बस याद वही रह जाना है।