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जी चाहता है अपना मुक़द्दर उतार दूँ / मेहर गेरा

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जी चाहता है अपना मुक़द्दर उतार दूँ
काग़ज़ पे एक फूल-सा पैकर उतार दूँ

तस्वीर पर ये किसने सियाही उड़ेल दी
काग़ज़ पे किस तरह वही मंज़र उतार दूँ

अपने वजूद की है बहुत उलझने तो क्या
सीने में आज दर्द का खंज़र उतार दूँ

मैं किससे दिल की बात कहूँ मेहर इन दिनों
किस छत पे आरज़ू का कबूतर उतार दूँ।