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जुमूद / अख़्तर-उल-ईमान

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तुम से बेरंगी-ए-हस्ती का गिला करना था
दिल पे अंबार है ख़ूँगश्ता[1] तमन्नाओं का
आज टूटे हुए तारों का ख़याल आया है
एक मेला है परेशान-सी उम्मीदों का
चंद पज़मुर्दा[2] बहारों का ख़याल आया है
पाँव थक-थक के रह जाते हैं मायूसी में
पुरमहन[3] राहगुज़ारों का ख़याल आया है
साक़ी-ओ-बादा नहीं जाम-ओ-लब-ए-जू[4] भी नहीं
तुम से कहना था कि अब आँख में आँसू भी नहीं


उर्दू से लिप्यंतर : लीना नियाज

शब्दार्थ
  1. जिनसे ख़ून टपक रहा है
  2. मुरझाई हुई, कुम्हलाई हुई
  3. दुखभरी
  4. नदी किनारे