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जो कभी मुख्तार थी अब वो सवाली हो गयी / शेष धर तिवारी

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जो कभी मुख्तार थी अब वो सवाली हो गयी
ज़िंदगी मेरी लगे मुफलिस की थाली हो गयी

भून डाला था बहू को, क्या करेगा अब बता
देख तेरी लाडली फूलों की डाली हो गयी

देख उनको जुल्फदोश, इन बादलों को क्या हुआ
कायनात उनकी घनी छाया से काली हो गयी

बाद बरसों देख मुझको मुस्कराए तो लगा
नौकरी पर जैसे मेरी फिर बहाली हो गयी

क्या पता था ऐसा भी होता है ताबे इश्क में
रेत जो पैरों तले उजली थी, काली हो गयी