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जो कोई समझा नहीं उस मुख के आँचल के मआनी कूँ / वली दक्कनी

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जो कोई समझा नहीं उस मुख के आँचल के मआनी कूँ
वो क्‍यूँ बूझे कहो उस शोख़ चंचल के मआनी कूँ

करें गर बहस उस अँखियाँ के जादू की सहर साज़ाँ
न पहुँचे कोई बारीकी में काजल के मआनी कूँ

वो यूसुफ़ कूँ कहे सानी सो उस बेमिस्‍ल का क्‍यूँ कर
दो बीं कर जो कि समझा चश्‍म-ए-अहवल के मआनी कूँ

न निकले बहर-ए-हैरत सूँ जो हुए उस मुख का हमज़ानू
ये बूझे वो जो पहूँचा है सजन जल के मा'नी कूँ

सफ़ाई देख उसके मुख की है बेहोश सर ता पा
यही तहक़ीक समझो ख़्वाब मख़मल के मआनी कूँ

बयाँ ज़ुल्‍फ़-ए-बदीई का है 'सादुद्दीन' का मतलब
अझूँ लग तुम नहीं समझे मुतव्वल के मआनी कूँ

'वली' उस माह-ए-कामिल की हक़ीक़त जो नहीं समझा
वो हरगिज़ नईं बुझा आलम में अकमल के मआनी कूँ