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जो जीने-मरने का जज़्ब: दिलों में रखते हैं / दरवेश भारती

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जो जीने-मरने का जज़्ब: दिलों में रखते हैं
वो मुश्किलों से कहाँ हार मान सकते हैं

निखरते हैं वही कुन्दन की तरह जीवन में
जो जिद्दो-जेह्द की भट्ठी में तपते रहते हैं

सियासी रंगमहल है अजीब रंगमहल
यहाँ अवाम को सपने सलोने छलते हैं

ग़ज़ल में ऐसे अरूज़ी भी मेह्रबान हैं आज
जो हाथ सर पे न रखकर गले पे रखते हैं

खुलूस और महब्बत से क्या ग़रज़ उनको
जो सोते-जागते नफ़रत के ख़्वाब बुनते हैं

तू जिनकी आस लगाये हुए है वो तो खुद
पराये पंखों के दम पर उड़ान भरते हैं

अदब में भी हैं कुछ ऐसे अदीब ऐ 'दरवेश'
जो अपना काम निकलते ही चल निकलते हैं