भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जो धुनिया तौ भी मैं राम / दरिया साहब

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जो धुनिया तौ भी मैं राम तुम्हारा।
अधम कमीन जात मति-हीना, तुम तौ हौ सिरताज हमारा॥
कायाका जंत्र सब्द मन मुथिया सुखमन ताँत चढ़ाई।
गगन-मँडलमें धुनियाबैठा, मेरे सतगुरु कला सिकाई॥
पाप पान हर कुबुध काँकड़ा, सहज-सहज झड़ जाई।
घुंडी गाँठ रहन नहिं पावै, इकरंगी होय आई॥
इकरँग हुआ, भरा हरि चोला, हरि कहै, कहा दिलाऊँ।
मैं नाहीं मेहनतका लोभी, बकसो मौज भक्ति निज पाऊँ॥
किरपा करि हरि बोले बानी, तुम तौ हौ मम दास।
'दरिया' कहे, मेरे आतम भीतर मेलो राम भक्त-बिस्वास॥