भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

जो बुज़ुर्गों की किसी भी बात को सुनता नहीं / राहुल शिवाय

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जो बुज़ुर्गों की किसी भी बात को सुनता नहीं
ज़िन्दगी में वह कभी भी आगे बढ़ सकता नहीं

क्या हुआ जो कह दिया उसने तुम्हें 'मैं हूँ बुरा'
हर किसी से रंज मैं, उसकी तरह रखता नहीं

ख्वाब मेरी आँखों से कोई चुराकर ले गया
कोई मेरे आँसुओं के साथ अब रहता नहीं

रोटियाँ दो-चार दे दो स्वपन के बदले हमें
भाषणों से पेट नेता जी, कभी भरता नहीं

मुश्किलें साथी न हों तो ज़िन्दगी किस काम की
हो सतह चिकनी बहुत तो कोई चल सकता नहीं

जान ले लेगी किसी दिन ये घुटन, खामोशी ये
सिर्फ़ लिखने के लिए मैं शे'र तो लिखता नहीं