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जो होना था वह हुआ ही नहीं / मनीष मूंदड़ा

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त्रस्त है अब ऋ तुएँ भी
सूरज भी चाँद भी
झुलस गयी अब ये धरा भी
आसमान घट विहीन
उजाड़ हुआ बियाबान जंगल भी
सागर लेते जलसमाधि
पशु पक्षी होते विलुप्त
भाषा हो चली क्षीण
संस्कृति होती विलीन
आदर घटा
सम्मान हटा
दुखों का सागर हुआ अंतहीन
दिलों से प्यार
आँखो से शर्म
जुबान से जायका
मानव से मानवता
सभी कुछ तो मानो बस रिसते से जा रहे हैं
हाँ मगर
आबादी बढ़ी
आकार बढ़ा
लालच बढ़ा
लालसा बढ़ी
बढ़ी लोगों में पीड़
वैमनस्य बढ़ा
हिंसा बढ़ी
बढ़ गयी दो दिलों में दूरी
वो सबकुछ हुआ जो ना होना था
और जो होना था
वो हुआ ही नहीं...