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झर रे रुधिर / अनंत पटनायक / दिनेश कुमार माली

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रचनाकार: अनंत पटनायक (1910-1987)

जन्मस्थान: चनाहटा, कटक

कविता संग्रह: रक्तशिखा(1939), तर्पण करे आजि (1949), शांतिशिखा(1952), किंचित(1959), अलोड़ा लोड़ा(1964), छाइ छिटा(1966), अवांतर(1978), सूत्रटिए सुकृतिर (1986), अऋतुऋतु (1986)


झर रे अधीर हृदय के रुधिर, झर रे, झर।
बरसते सावन के झरणों से बढ़कर तू
भर दो धरणी-तल
झर रे, रुधिर, झर रे, झर

चाह नहीं आज रुद्ध-मन, दग्ध-श्वास की करुण-कथा
चाह नहीं आज अर्घ्य दिवाली, डरे नयनों की सिक्त -व्यथा
गर्भ भेदकर जिसने लाई तामसी रात में नव जीवन-रीत
उसे चाहिए आज खुले-हृदय के खून से धूले पागल-गीत
हर पथ पर उसके सजा दो, हृदय-मंदार के छिन्न स्वर

झर रे, रुधिर, झर रे, झर
झरे त्वरित दुख दूरकर नीरव सोच नयन आमोद।
मृत्यु-जल में तैरते हुए तोड़ता जो तेरे लिए रक्त कुमुद
कृष्ण-नाग के दंशन से क्या झुक जाएगा उसका वजूद  ?
तुषार तुषार में शस्य- हास
नग्न उषा का रक्त प्रयास
जैसे शिल्पी-तूलिका ने खिलाया कोई स्वप्न-विनोद ।
रक्त रे ! मेरे हृदय में रहकर झुक मत जाना
भुला देना क्षुद्र-ममता, बंद-गृह के बंदी स्वर
झर रे, रुधिर अधीर, झर
शून्य सारे स्वप्निल-कलश, हर्ष-सुधा भर रे भर
संजीवनी निकालकर वक्ष से निर्जीव मन में देते हो डाल
चंदन-धूप की क्या जरुरत, जिसके पास हो रक्त-ताल
जीर्ण जीवन में यौवन देकर
बंधन-शत को और खोलकर
अँधेरे -पथ की अग्रणी तू, जलाओ मुक्ति-प्रदीप निडर
झर रे, रुधिर, झर रे झर
उसके लिए तू सप्तसागर, आकुल उत्तरल कर रे कर ।
चारों तरफ कांटें बिछाकर आँख बचाते जो मरता जाए
उसकी नित्य सुंगंध तुम्हारे ख़ुशी के वचन कहती जाए
मलय-आवेश के मत्त-देह में द्रवित होकर
असीम काल से तू स्थिर
झर रे,रुधिर, झर रे झर

मोगरा मालती गजरे में सजाये, खिलते सेमल पलाश-दल
झरता जा पुलकित होकर लहू मेरे, जन्मभूमि के जीवन-पथ
जंजीर टूटे मेरी जाति की, रथी बने उस सृजन-रथ
ले आओ ख़ुशी से शांति मैत्री सारे शाश्वत शत सख्य बल
झर रे, रुधिर अधीर, झर
अश्रु सागर की अग्नि वाणी तू, मेरे अंतर में जल रे जल
धूसर बालू के मैदानों में
शस्य सुषमा भरे खेतों में
झरते जाओ, झरते जाओ, प्राणों के प्रांगन में, पोंछ दो मन से परायापन
झर रे, रुधिर झर रे झर
कराल काल के कृष्ण कपोल स्वपन तारा जैसे झलको