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झूल लाल तू चंदन पलना / सरोजिनी कुलश्रेष्ठ

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माता लाड़ लड़ाती ललना
झूल लाल तू चंदन पलना

अंचल की छाया में दीपक
ऐसे में तुमको ढक लूँगी
दुष्ट पवन से बाल न बांका
मैं तेरा प्रिय! होने दूँगी

जीवन भर तू रहे प्रकाशित
रे कुलदीप! जगमग जलना

राम बनेगा तू तो मेरा
माईं कौशल्या बन जाऊँगी
ऐसा ही यश फैलाना तू
मैं तो बलिहारी जाऊँगी
रेशम की डोरी है चंदन को पलना
झूल मेरे लाल तू सोने का पलना

तारों के मोती लायेगी
तेरी निंदिया आज रात में
स्वप्न लोक में ले जायेगी
तुझे उड़ाकर बात-बात में

लेकर आना सुघर खिलौने
तितली-सी परियों से मिलना।