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टीला और घास / विजय वर्मा

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टीले के धड़ पर
दूब का तिनका जन्मा देख कर
कुछ हैरानगी भी हुई
पर ख़ुशी तो सच में बहुत हुई
क्योंकि ये टीला
धरती के आंगन की
हरी सिरजना को
क़बूल करने में
समझता तो था
पर जान-बूझ कर
मुँह फेर कर
अपनी बड़ाई
बरक़रार रखना चाहता था
धरती की गोद से जुड़ कर भी
इस ने भरम पाला था एक
एक अलग राजसिंहासन का
अपनी ऊँचाई और
बड़ाई का
दूब ने
यत्न किया बहुत बार
मेहनत ने जख़्म खाए
सूख गया
खाता रहा सेंक
अपने अस्तित्व को बचाकर रखने के लिए
ऊँची-ऊँची लहरों के थपेड़े खाए
तब जा कर दोनों एक जान हुए
क़ुदरत कमाल है
साँझी बेमिसाल है।
एक जैसे व्यवहार के साथ
दोनों को पतियाती
याद कराती
अपना-अपना अस्तित्व
कि तुम
एक ही धरतीकी सिरजना हो
कठिन है
एक होकर
एक दूसरे के अस्तित्व का
आदर करते हुए
मिल-जुल कर रहने में ही
आप दोनों की भलाई है।

मूल डोगरी से अनुवाद : पद्मा सचदेव