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टीस ने जब कभी भी रूह की अगुवाई की / सूरज राय 'सूरज'

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टीस ने जब कभी भी रूह की अगुवाई की।
दर्द ने ख़ूब मेरी हौसला अफ़ज़ाई की॥

चारसू फ़ैल गए नफरतों के इंटरनेट
अब ज़रूरत है मुहब्बत की वाई-फ़ाई की॥

कुछ बिकेगा तो नहीं वक़्त गुज़र जायेगा
खोल ली एक दुकां नेकी-ओ-सच्चाई की॥

रेड जिस दिन से-सी बी आई की पड़ी घर पे
बढ़ गई क़द्र मुहल्ले में बड़े भाई की॥

माँ फ़लक तेरी बुलन्दी को करे है सजदा
बात करते हैं समन्दर तेरी गहराई की॥

सूट लफ़्फ़ाज़ी का "सूरज" तू पहन लेगा मगर
कौन बाँधेगा भला गाँठ तेरी टाई की॥