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टूटी हुई यह घण्टी / पाब्लो नेरूदा / मंगलेश डबराल

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टूटी हुई यह घण्टी
गाना चाहती है निर्बाध :
इसकी धातु अब हरी हो चली :
इसका रँग जँगल का
जँगल के पोखरों के पानी का
पत्तों पर गिरते दिन का

पीतल के हरे रँग का एक खण्डहर
घण्टी लुढ़कती हुई
और सोई हुई
लता-गुल्मों के जाल में
पीतल का पक्का सुनहरा रँग
मेंढ़क के रँग में बदलता हुआ
पानी और तट की नमी के हाथ
बनाते हैं पीतल को हरा
और घण्टी को मुलायम

टूटी हुई यह घण्टी
उजाड़ हो चुके बाग़ीचे में
घने झाड़-झँकाड़ के बीच फेंकी हुई ।
हरी घण्टी, घायल
अपने निशान घास को सौंपती है
किसी को बुलाती नहीं, कोई नहीं आता
उसके हरे प्याले के आसपास,
सिर्फ़ एक तितली
ढहे हुए पीतल पर बैठी हुई
उड़ती है, फड़फड़ाती है
अपने पीले पँख ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : मंगलेश डबराल