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डरपत मन मोरा / सुधीर सक्सेना

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सुनो,
राम जी !
आकाश में जब भी गरजते हैं मेघ,
कड़कती हैं बिजलियाँ
मेरा भी मन डरता है
ठीक तुम्हारी तरह
प्रिया से दूर हूँ मैं
इंद्रप्रस्थ में एकाकी