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डी० एल० राय का एक गाना / जय गोस्वामी / रामशंकर द्विवेदी

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इस जीवन में पूरी नहीं हुई साध —
अपने को प्रस्तुत करता हूँ रोज़
केवल तुम्हारे लिए ।

अपने को प्रस्तुत करता हूँ रोज़
पर, पूरी नहीं हुई साध
इस जीवन में

प्रस्तुति है बहुत कठिन ।
सचमुच में कठिन ।

यद्यपि तुम्हारा आना,
ताकना और हँस पड़ना यकायक
कितना नहीं है सहज !

देखते-देखते बीत गई शाम
शेष हो गया दिन
तुम्हें आगे लेकर
शाम को जाता हूँ बाहर

बस पर चढ़ाकर
लौटते रास्ते में देखता हूँ कि
मेरे साथ है और एक जन

तृतीया का क्षीण
बाँका चान्द
इस जीवन में पूरी नहीं हुई साध ...
इस जीवन में ...

मूल बाँगला भाषा से अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी